लहरों के बीच रखा हुआ वादा
नर्म धूप के किनारे
और बहती हुई हवा के दरमियान
मैंने तुम्हें पुकारा
आवाज़ से नहीं,
एक धीमे से ख़याल में,
जो किसी तक पहुँचने की जल्दी में नहीं था।
तुम आईं नहीं,
पर कुछ बदला
पानी की सतह पर
एक हल्की-सी कंपकंपी उठी,
जैसे किसी ने
अंदर ही अंदर
तुम्हारा नाम छुआ हो।
किनारे चुप थे,
पेड़ भी स्थिर,
पर उस ठहराव में
एक अनकहा संवाद था
तुम्हारे और मेरे बीच,
जिसे कोई सुन नहीं सकता।
मैंने कोई अक्षर नहीं लिखे,
कोई निशान नहीं छोड़ा,
बस एक वादा
धीरे से
लहरों के बीच रख दिया
कि तुम आओ या न आओ,
यह प्रतीक्षा
बहती नहीं।
हर शाम
जब सूरज ढलता है
और पानी सुनहरा हो जाता है,
वह वादा
थोड़ा और गहरा हो जाता है
जैसे समय
उसे मिटाने की जगह
संभाल रहा हो।
तुम्हारा होना
अब किसी जगह पर नहीं,
किसी नाम में नहीं
तुम
उस ठहराव में हो
जो बहते हुए भी
अडिग रहता है।
लहरों के बीच रखा हुआ वादा
टूटता नहीं
बस
हर गुज़रते पल के साथ
और अधिक
सच हो जाता है।
मुकेश ,,,,,,,
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