इन्द्रियों की अगोचरता और ब्रह्म की सर्वव्यापकता — ‘मनसो जवीयः’ का गहन अद्वैतार्थ
मूल पदांश (संशोधित रूप में)
न एनत् देवा द्योतनात् (द्योतनशीलाः) देवाः, अश्नुवन्—न प्राप्नुवन्ति।
तेभ्यः मनः जवीयः।
मनोव्यापार-व्यवहितत्वात् आभासमात्रम् अपि आत्मनः न एव देवानां विषयः भवति।
यस्मात् जवनात् मनसः अपि पूर्वम् एव गतं।
धूमवत् व्याप्तित्वात्।
सर्वव्यापि तत् आत्मतत्त्वं सर्वसंसारधर्मवर्जितं, स्वेन निरुपाधिकेन स्वरूपेण अविक्रियम् एव सत् उपविष्टम्।
यह आत्मा इन्द्रियों (देवों) द्वारा ज्ञात नहीं किया जा सकता, क्योंकि वे केवल बाह्य वस्तुओं को प्रकाशित करने वाले हैं।
उनसे भी मन अधिक तीव्र है।
फिर भी मन के व्यापार के कारण आत्मा केवल आभास मात्र भी इन्द्रियों का विषय नहीं बनता।
क्योंकि आत्मा मन से भी पहले ही सर्वत्र विद्यमान है।
धुएँ के समान सर्वत्र व्याप्त होने के कारण वह सबमें फैला हुआ है।
वह आत्मतत्त्व सर्वव्यापक है, संसार के सभी धर्मों से रहित है, और अपने निरुपाधिक स्वरूप में सदा अविकार रूप से स्थित है।
यह भाष्यांश ब्रह्म की अगोचरता (इन्द्रियों से परे होना) और उसकी सर्वव्यापकता को अत्यंत सूक्ष्म ढंग से स्पष्ट करता है। यहाँ शंकराचार्य बताते हैं कि क्यों आत्मा को न तो इन्द्रियाँ जान सकती हैं और न ही मन उसे पूर्णतः पकड़ सकता है।
सबसे पहले “देवाः” शब्द का अर्थ है—इन्द्रियाँ, जो “द्योतन” अर्थात् प्रकाशन का कार्य करती हैं। ये इन्द्रियाँ बाह्य वस्तुओं—रूप, रस, गंध आदि—को जानने में समर्थ हैं, परंतु आत्मा इनका विषय नहीं बन सकता। कारण यह है कि आत्मा स्वयं प्रकाशस्वरूप (चैतन्य) है, और जो स्वयं प्रकाश है, उसे किसी अन्य साधन से प्रकाशित नहीं किया जा सकता। जैसे दीपक स्वयं को प्रकाशित करने के लिए किसी अन्य दीपक की आवश्यकता नहीं होती, वैसे ही आत्मा स्वयंप्रकाश है।
अतः कहा गया—“न एनत् देवा अश्नुवन्”—इन्द्रियाँ इसे प्राप्त नहीं कर सकतीं।
अब प्रश्न उठता है—जब इन्द्रियाँ नहीं जान सकतीं, तो क्या मन जान सकता है?
मन इन्द्रियों से सूक्ष्म और अधिक तीव्र है—“तेभ्यः मनः जवीयः”। मन संकल्प-विकल्प के द्वारा सूक्ष्मतम विषयों का भी चिंतन कर सकता है। परंतु शंकराचार्य यहाँ एक महत्वपूर्ण सीमा बताते हैं—
“मनोव्यापार-व्यवहितत्वात्”—मन के अपने ही व्यापार (संकल्प-विकल्प) के कारण आत्मा उसमें प्रत्यक्ष नहीं होता।
मन वस्तुओं का विचार करता है, परंतु आत्मा कोई “वस्तु” नहीं है। वह तो स्वयं उस विचार-प्रक्रिया का साक्षी है। इसीलिए आत्मा मन के लिए भी “विषय” नहीं बन सकता—वह केवल आभासमात्र रूप में प्रतीत होता है।
अब “मनसो जवीयः” का गहन अर्थ स्पष्ट किया गया है—
आत्मा मन से भी पहले ही सर्वत्र विद्यमान है—“मनसः अपि पूर्वम् एव गतम्”।
अर्थात् मन जहाँ भी पहुँचता है, वहाँ आत्मा पहले से ही उपस्थित है। इस प्रकार आत्मा की “तीव्रता” वास्तव में उसकी सर्वव्यापकता का सूचक है, न कि किसी प्रकार की गति।
“धूमवत् व्याप्तित्वात्”—यहाँ एक सुंदर दृष्टांत दिया गया है। जैसे धुआँ पूरे वातावरण में फैल जाता है और सर्वत्र व्याप्त हो जाता है, वैसे ही आत्मा भी सर्वत्र व्याप्त है। हालाँकि यह दृष्टांत पूर्ण नहीं, क्योंकि धुआँ वास्तव में गतिशील है, जबकि आत्मा नित्य अचल है—फिर भी यह उसकी व्यापकता को समझाने के लिए उपयुक्त है।
अंततः शंकराचार्य निष्कर्ष देते हैं
यह आत्मा सर्वव्यापी, संसारधर्मवर्जित (जन्म, मृत्यु, सुख-दुःख आदि से रहित), और निरुपाधिक स्वरूप में अविकार है।
वह न कर्ता है, न भोक्ता; वह केवल साक्षी है—सदा एकरस, शुद्ध चैतन्य।
इस भाष्यांश में स्पष्ट किया गया है कि आत्मा इन्द्रियों और मन दोनों से परे है, क्योंकि वह स्वयं प्रकाशस्वरूप है। उसकी “तीव्रता” उसकी सर्वव्यापकता में निहित है, न कि गति में। वह सर्वत्र विद्यमान होकर भी अविकार और निरुपाधिक है। इस ज्ञान से साधक समझता है कि आत्मा कोई ज्ञेय वस्तु नहीं, बल्कि स्वयं ज्ञान का आधार है—यही अद्वैत का परम निष्कर्ष है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,
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