अविक्रिय ब्रह्म में क्रियाभास — अविद्या की दृष्टि से गतिशीलता का मिथ्यात्व
मूल पदांश (संशोधित रूप में)
क्रिया अज्ञानवती इव अविवेकिनां मूढानाम् अनेकम् इव च प्रतिभासते इति एतत् आह।
तत् धावतः द्रुतं गच्छतः अन्यान् आत्मविलक्षणान् मनो-वाक्-इन्द्रिय-प्रभृतिन् अतीत्य गच्छति इव।
अथ स्वयम् एव वदति—तिष्ठत् इति।
स्वयम् अविक्रियम् एव सत् इत्यर्थः।
अज्ञानयुक्त, अविवेकी और मूर्ख लोगों को ब्रह्म में क्रिया (गति) और अनेकता का आभास होता है।
वास्तव में वह (ब्रह्म) मन, वाणी और इन्द्रियों आदि से भी अधिक तीव्र होकर उन्हें पार करता हुआ प्रतीत होता है।
परंतु वास्तव में वह स्वयं स्थिर ही है—“तिष्ठत्”।
अर्थात् वह स्वयं सदा अविकार और अचल है।
यह भाष्यांश अद्वैत वेदान्त के एक अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्धांत को स्पष्ट करता है—ब्रह्म में जो क्रिया (गति) और अनेकता दिखाई देती है, वह वास्तविक नहीं, बल्कि अज्ञानजन्य आभास है।
शंकराचार्य यहाँ स्पष्ट करते हैं कि ब्रह्म स्वभावतः अविक्रिय (निष्क्रिय) और एकमेव है। उसमें न कोई गति है, न कोई परिवर्तन, न ही कोई भेद। फिर भी संसार में हम विविधता, क्रिया और परिवर्तन का अनुभव करते हैं। यह विरोधाभास कैसे समझा जाए?
इसका उत्तर है—अविद्या (अज्ञान)।
“अविवेकिनां मूढानाम्”—जो लोग विवेक (सत्य और असत्य का भेद) नहीं कर पाते, वे ब्रह्म में भी संसार के गुण आरोपित कर देते हैं। उन्हें ऐसा प्रतीत होता है कि ब्रह्म चलता है, कार्य करता है, और अनेक रूपों में विभक्त है। परंतु यह केवल प्रतिभास (appearance) है, न कि वास्तविकता।
जब कहा जाता है—“तद् धावतो द्रुतं गच्छतः अन्यान् अतीत्य”—तो इसका अर्थ यह नहीं कि ब्रह्म वास्तव में दौड़ रहा है या कहीं जा रहा है। इसका अभिप्राय यह है कि मन, वाणी और इन्द्रियाँ—जो स्वयं अत्यंत तीव्र मानी जाती हैं—वे भी ब्रह्म को नहीं पकड़ सकतीं। ऐसा प्रतीत होता है मानो ब्रह्म उनसे आगे निकल गया हो।
यहाँ “इव” (मानो) शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह दर्शाता है कि यह केवल उपचारात्मक कथन है, वास्तविक गति का संकेत नहीं। ब्रह्म कहीं नहीं जाता—वह तो पहले से ही सर्वत्र विद्यमान है।
फिर शंकराचार्य स्वयं ही इस भ्रम को दूर करते हैं—
“तिष्ठत् इति”—वह स्थिर है।
यहाँ “तिष्ठत्” का अर्थ है—नित्य, अचल, अविकार।
अतः जो पहले “गति” का वर्णन किया गया, वह केवल उपाधि-जन्य आभास है। वास्तव में ब्रह्म अपने निरुपाधिक स्वरूप में सदा एकरस, अचल और अविक्रिय है।
एक दृष्टांत से इसे समझा जा सकता है—
नदी के किनारे खड़े होकर यदि कोई व्यक्ति पानी में चंद्रमा का प्रतिबिंब देखे, तो उसे लगेगा कि चंद्रमा हिल रहा है। परंतु वास्तव में चंद्रमा स्थिर है; जल की गति के कारण यह भ्रम उत्पन्न होता है।
इसी प्रकार, ब्रह्म में कोई क्रिया नहीं, परंतु मन और इन्द्रियों की गतिविधियों के कारण उसमें क्रिया का आभास होता है।
यहाँ शंकराचार्य का मुख्य उद्देश्य यह बताना है कि—
संसार का समस्त क्रियात्मक रूप ब्रह्म का नहीं, बल्कि अविद्या का परिणाम है।
जो साधक इस तथ्य को जान लेता है, वह ब्रह्म की नित्य शुद्ध, बुद्ध और मुक्त अवस्था का अनुभव करता है।
इस भाष्यांश में यह प्रतिपादित किया गया है कि ब्रह्म में जो गति और अनेकता का आभास होता है, वह अज्ञान के कारण है। वास्तव में ब्रह्म सदा अविकार, अचल और एक है। “गति” का वर्णन केवल उपाधि के कारण प्रतीत होता है। इस प्रकार, जो साधक इस मिथ्यात्व को समझ लेता है, वह ब्रह्म की वास्तविक, निश्चल और अद्वैत सत्ता का साक्षात्कार करता है—यही मोक्ष का सार है।
मुकेश ,,,,,,,,,,
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