दोपहर आराम करती स्त्री
1
दोपहर की धूप में
वो चुपचाप लेटी है,
जैसे समय ने
थोड़ी देर साँस ली हो।
2
आँखें बंद हैं,
पर नींद पूरी नहीं
जैसे भीतर
अब भी घर चलता हो।
3
उसके पास
कुछ अधूरे काम पड़े हैं,
पर इस पल
वो खुद को चुन रही है।
4
पलंग की चादर
हल्की-सी सिकुड़ी है,
जैसे थकान
अब उतर रही हो।
5
खिड़की से आती हवा
उसके बालों को छूती है,
जैसे कोई
धीरे से हाल पूछ रहा हो।
6
हाथ ढीले पड़े हैं,
पर उँगलियों में
दिन भर की भागदौड़
अब भी बची है।
7
कमरे में सन्नाटा है,
पर उसकी साँसें
एक धीमा गीत गा रही हैं।
8
वो सोती नहीं,
बस थोड़ी देर
दुनिया से उतर जाती है।
9
दोपहर का ये ठहराव
उसे फिर से जोड़ता है,
जैसे टूटा हुआ दिन
धीरे-धीरे सँवर रहा हो।
10
आराम करती स्त्री
घर के बीचोंबीच
अपना छोटा-सा
आसमान बना लेती है।
No comments:
Post a Comment