होम | रोज़नामचा | कविताएँ | कहानियाँ | विचार | ज्योतिष | लेखक

Wednesday, 22 April 2026

दोपहर—बरामदे में लेटा बुज़ुर्ग

दोपहर—बरामदे में लेटा बुज़ुर्ग

1

दोपहर की धूप

बरामदे तक आकर ठहर गई है,

वो चारपाई पर

धीरे-धीरे फैला हुआ है।

2

आँखें बंद हैं,

पर नींद गहरी नहीं

जैसे यादें

हल्की-हल्की चल रही हों।

3

पास में रखा लाठी

चुपचाप टिके है,

जैसे वक़्त का सहारा

कुछ देर को थम गया हो।

4

पंखा धीमे-धीमे घूमता है,

और हवा में

बीते दिनों की गंध है।

5

उसकी साँसें

लय में चलती हैं,

जैसे कोई पुराना गीत

धीरे-धीरे बज रहा हो।

6

एक हाथ सीने पर,

दूसरा ढीला पड़ा

जैसे पकड़ भी है

और छोड़ भी।

7

बरामदे की दीवारें

सब जानती हैं,

कितने मौसम

यहाँ गुज़र चुके हैं।

8

कभी हल्की-सी खाँसी

सन्नाटे को तोड़ती है,

फिर सब

वापस ठहर जाता है।

9

धूप सरकती है

उसके पैरों से सिर तक,

जैसे समय

चुपचाप उसे छू रहा हो।

10

दोपहर में लेटा बुज़ुर्ग

न सो रहा है,

न जाग रहा है,

बस जीए हुए दिनों में

धीरे-धीरे टहल रहा है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,

No comments:

Post a Comment