दोपहर—बरामदे में लेटा बुज़ुर्ग
1
दोपहर की धूप
बरामदे तक आकर ठहर गई है,
वो चारपाई पर
धीरे-धीरे फैला हुआ है।
2
आँखें बंद हैं,
पर नींद गहरी नहीं
जैसे यादें
हल्की-हल्की चल रही हों।
3
पास में रखा लाठी
चुपचाप टिके है,
जैसे वक़्त का सहारा
कुछ देर को थम गया हो।
4
पंखा धीमे-धीमे घूमता है,
और हवा में
बीते दिनों की गंध है।
5
उसकी साँसें
लय में चलती हैं,
जैसे कोई पुराना गीत
धीरे-धीरे बज रहा हो।
6
एक हाथ सीने पर,
दूसरा ढीला पड़ा
जैसे पकड़ भी है
और छोड़ भी।
7
बरामदे की दीवारें
सब जानती हैं,
कितने मौसम
यहाँ गुज़र चुके हैं।
8
कभी हल्की-सी खाँसी
सन्नाटे को तोड़ती है,
फिर सब
वापस ठहर जाता है।
9
धूप सरकती है
उसके पैरों से सिर तक,
जैसे समय
चुपचाप उसे छू रहा हो।
10
दोपहर में लेटा बुज़ुर्ग
न सो रहा है,
न जाग रहा है,
बस जीए हुए दिनों में
धीरे-धीरे टहल रहा है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,
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