पत्तों की फुसफुसाहट में लौटती आवाज़
संध्या जब धीरे-धीरे
पीपल की शाख़ों पर उतरती है,
तो हवा बोलना शुरू करती है
पर वह हवा नहीं होती,
वह किसी की लौटी हुई आवाज़ होती है।
पत्ते आपस में टकराते नहीं,
मानो कानों में कुछ कह रहे हों
एक गुप्त संवाद,
जो सिर्फ़ विरह जानता है।
मैं तने के पास खड़ा सुनता हूँ
कोई नाम स्पष्ट नहीं,
कोई शब्द पूरा नहीं,
पर अर्थ जैसे
दिल की मिट्टी में उतरता जाता है।
कहते हैं,
मृत्यु के बाद भी
कुछ ध्वनियाँ विलीन नहीं होतीं;
वे वायुमंडल में
सूक्ष्म तरंग बनकर ठहर जाती हैं।
शायद वही तरंगें
इन पत्तों में आकर
फुसफुसाती हैं।
कभी लगता है
यह तुम्हारी हँसी है,
जो धूप की तरह काँपती है।
कभी
एक अधूरी पुकार,
जो रात के तीसरे पहर
और स्पष्ट हो जाती है।
दीप की लौ स्थिर रहती है,
पर छाया हिलती है
जैसे कोई पास आकर
ठहर गया हो।
मैं हाथ बढ़ाता हूँ,
तने की खुरदरी सतह छूता हूँ,
और अचानक
हथेली में एक कंपन उतर आता है
जैसे शब्द नहीं,
सिर्फ़ उपस्थिति हो।
अगर आवाज़ सचमुच लौटती है,
तो वह कानों से नहीं,
स्मृति से सुनी जाती है।
पत्तों की हर सरसराहट
एक अक्षर है,
हवा की हर लहर
एक अधूरा वाक्य।
और मैं
उन सबको जोड़कर
तुम्हारी छवि बनाता हूँ।
शायद यह भ्रम हो,
शायद यह शोक की प्रतिध्वनि
पर जो लौटता है
वह शून्य नहीं होता।
पीपल अब भी खड़ा है,
जड़ों में अतीत,
शाख़ों में आकाश।
और उसके पत्तों की फुसफुसाहट में
हर रात
तुम्हारी आवाज़ लौट आती है
इतनी हल्की
कि टूट न जाए,
इतनी गहरी
कि भूल न पाऊँ।
मुकेश ,,,,
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