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Thursday, 2 April 2026

जब आत्मा प्यास लेकर लौटे

 जब आत्मा प्यास लेकर लौटे


जब आत्मा प्यास लेकर लौटे,

तो रात अपने दरवाज़े आधे खोल देती है।

पीपल की पत्तियाँ

धीरे-धीरे काँपती हैं

जैसे किसी अनदेखे क़दम की आहट

धरती ने महसूस की हो।


मिट्टी की मटिया में रखा जल

स्थिर नहीं रहता,

उसकी सतह पर

एक महीन-सी लहर उठती है

किसी स्मृति की उँगली

उसे छूकर गुज़री हो जैसे।


दीप की लौ

बिना हवा के भी डोलती है,

और छाया लंबी होकर

तने से अलग

धरती पर फैल जाती है।


कहते हैं

शुद्धि तक आत्मा भटकती है,

अपनी ही देह की राख के आसपास,

अपने ही नाम की गूँज के भीतर।

पर मैं जानता हूँ

वह केवल जल नहीं पीती,

वह अधूरी बातों की प्यास लेकर लौटती है।


जो शब्द कहे नहीं गए,

जो स्पर्श अधर में रह गए,

जो क्षमा माँगी नहीं गई

वही उसकी तृष्णा है।


मैं हर शाम

मटिया में ताज़ा जल भरता हूँ,

दीप में तेल डालता हूँ

जैसे तुम्हारी अनुपस्थिति को

थोड़ा सहने लायक बना रहा हूँ।


कभी-कभी लगता है

तुम सचमुच आती हो

न आँखों से दिखती हो,

न कानों से सुनाई देती हो,

पर भीतर एक कंपन होता है,

और हृदय की सतह पर

लहर-सी उठती है।


अगर आत्मा प्यास लेकर लौटे,

तो क्या वह केवल पानी चाहेगी?

या वह उस प्रेम की तलाश में होगी

जो मृत्यु से पहले भी अधूरा था?


पीपल का तना

हमारे बीच खड़ा है

जड़ों में धरती का अँधेरा,

पत्तों में आकाश की रोशनी।

बीच में लटकती मटिया

मानो कहती है

“जल भी यहाँ है,

दीप भी यहाँ है,

बस एक पुकार बाकी है।”


और मैं हर रात

धीमे से तुम्हारा नाम लेता हूँ

कि यदि सचमुच

तुम प्यास लेकर लौटो,

तो तुम्हें यह यक़ीन मिले

कि यहाँ अभी भी

एक दीप तुम्हारे लिए जलता है।


क्योंकि प्रेम

शुद्धि की तिथि से नहीं बँधता

वह तो तब तक लौटता है

जब तक स्मृति में

जल की एक बूँद

और रोशनी की एक लौ

बाक़ी रहती है।


मुकेश ,,,,,,

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