अपरिवर्तनशील ब्रह्म और प्रपंच में एकत्व — शंकरमत का सूक्ष्म निरूपण
मूल पदांश (संशोधित रूप में)
प्रच्युतिः तद् रहितं सदा एकरूपम् इत्येव।
तच्च एकं सर्वभूतेषु।
ब्रह्म में किसी प्रकार का परिवर्तन (प्रच्युतिः) नहीं होता; वह सदैव एकरस और एक ही स्वरूप वाला है।
और वही एक ब्रह्म सभी प्राणियों में स्थित है।
इस भाष्यांश में आदि शंकराचार्य ब्रह्म के नित्य, निर्विकार और सर्वव्यापक स्वरूप का अत्यंत सूक्ष्म विवेचन करते हैं। यहाँ दो मुख्य तत्त्व प्रतिपादित किए गए हैं—
(1) ब्रह्म की अपरिवर्तनशीलता (अविकारिता)
(2) ब्रह्म की सर्वभूतात्मकता (सर्वत्र एकत्व)
प्रथम पद “प्रच्युतिः” का आशय है—स्वरूप से विचलन या परिवर्तन। संसार की सभी वस्तुएँ परिवर्तनशील हैं—वे जन्म लेती हैं, बढ़ती हैं, और अंततः नष्ट हो जाती हैं। परंतु ब्रह्म ऐसा नहीं है। वह नित्य है, अविनाशी है, और उसमें किसी प्रकार का विकार नहीं होता। इसीलिए कहा गया—“तद् रहितं”—अर्थात् वह किसी भी प्रकार की प्रच्युति (परिवर्तन) से रहित है।
शंकराचार्य का यह सिद्धांत अद्वैत वेदान्त का आधार है—जो वस्तु बदलती है, वह नित्य सत्य नहीं हो सकती। अतः ब्रह्म, जो परम सत्य है, उसमें कोई परिवर्तन संभव नहीं। यदि उसमें परिवर्तन मान लिया जाए, तो वह भी संसार की वस्तुओं की तरह अनित्य हो जाएगा, जो कि शास्त्रसम्मत नहीं है।
“सदा एकरूपम्”—यहाँ ब्रह्म की अखंडता और समरूपता का प्रतिपादन है। ब्रह्म में कोई भेद नहीं—न तो आंतरिक (स्वगत भेद), न ही बाह्य (सजातीय या विजातीय भेद)। वह सर्वथा अद्वैत, एकरस चैतन्य है। जैसे समुद्र का जल सर्वत्र एक ही स्वाद का होता है, वैसे ही ब्रह्म सर्वत्र एक ही स्वरूप में विद्यमान है।
अब प्रश्न उठता है—यदि ब्रह्म एक और अपरिवर्तनशील है, तो यह विविध संसार कैसे प्रतीत होता है? इसका उत्तर शंकराचार्य अविद्या (माया) के माध्यम से देते हैं। यह विविधता वास्तविक नहीं, बल्कि प्रतीतिमात्र है। जैसे एक ही सूर्य अनेक जलाशयों में अनेक रूपों में प्रतिबिंबित होता है, वैसे ही एक ही ब्रह्म अनेक जीवों के रूप में दिखाई देता है।
“तच्च एकं सर्वभूतेषु”—यह वाक्य ब्रह्म की सर्वव्यापकता को दर्शाता है। वही एक आत्मा सभी प्राणियों में स्थित है। भिन्न-भिन्न शरीर, मन और बुद्धि के कारण हमें भेद दिखाई देता है, परंतु आत्मा के स्तर पर कोई भेद नहीं है। यही अद्वैत का मूल सिद्धांत है—“एकमेवाद्वितीयम्”।
मुकेश ,,,,,,,,,,,
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