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Thursday, 16 April 2026

अचलता में सर्वगतिशीलता — ब्रह्म के अद्वैत स्वरूप का रहस्य

अचलता में सर्वगतिशीलता — ब्रह्म के अद्वैत स्वरूप का रहस्य


मूल पदांश (संशोधित रूप में)

अनेजत् न एजत्।
‘एज्’ धातुः कम्पने; कम्पनं चरनं स्वावस्थातः विचलनम्।


वह (ब्रह्म) स्वयं नहीं चलता (अनेजत्), और फिर भी चलता हुआ प्रतीत होता है (एजत्)।

‘एज्’ धातु का अर्थ है—कंपन या गति, अर्थात् अपनी अवस्था से विचलित होना।


यह सूक्ष्म भाष्यांश ईशावास्योपनिषद् के उस गूढ़ वाक्य का स्पष्टीकरण है, जिसमें ब्रह्म के विरोधाभासी प्रतीत होने वाले स्वरूप को प्रकट किया गया है—"तदेजति तन्नैजति"। शंकराचार्य इस पद के माध्यम से यह स्पष्ट करते हैं कि ब्रह्म की वास्तविकता को समझने के लिए सामान्य लौकिक तर्कों से ऊपर उठना आवश्यक है।

यहाँ ‘अनेजत्’ का अर्थ है—जो कभी नहीं चलता, जो सर्वथा अचल है। ब्रह्म नित्य, निरवयव, सर्वव्यापक और कूटस्थ (अपरिवर्तनीय) है। उसमें कोई परिवर्तन, विकार या गति संभव नहीं, क्योंकि गति तो उसी में होती है जो सीमित हो और एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाए। परंतु ब्रह्म तो सर्वत्र व्याप्त है—जहाँ जाने के लिए कोई अन्य स्थान ही नहीं है। अतः वह अचल है।

फिर ‘न एजत्’—अर्थात् वह चलता है—यह कथन क्यों? इसका उत्तर शंकराचार्य अद्वैत सिद्धांत के आधार पर देते हैं। यद्यपि ब्रह्म स्वयं अचल है, फिर भी उपाधियों (शरीर, मन, इन्द्रियाँ) के साथ संबंध के कारण वह गतिमान प्रतीत होता है। जैसे सूर्य स्वयं आकाश में स्थिर है, परंतु जल में उसके प्रतिबिंब के हिलने से वह भी हिलता हुआ प्रतीत होता है, वैसे ही आत्मा शरीर की गतियों के कारण चलती हुई प्रतीत होती है।

यहाँ ‘एज्’ धातु का अर्थ—कंपन या अपनी अवस्था से विचलन—विशेष महत्व रखता है। ब्रह्म में ऐसा कोई विचलन नहीं होता, क्योंकि वह स्वरूपतः पूर्ण और अचल है। लेकिन जब वही ब्रह्म जीव के रूप में अविद्या के कारण शरीरादि से तादात्म्य कर लेता है, तब उसमें कर्तृत्व और भोक्तृत्व का आभास होता है, और वही गति का अनुभव होता है।

इस प्रकार, यह द्वन्द्वात्मक कथन—“न चलता है, फिर भी चलता है”—वास्तव में दो स्तरों की सत्ताओं का निरूपण है—

  1. पारमार्थिक सत्य (Absolute Reality) — जहाँ ब्रह्म अचल, अविकार और निरुपाधि है।
  2. व्यवहारिक सत्य (Empirical Reality) — जहाँ वही ब्रह्म जीव के रूप में गतिशील प्रतीत होता है।

शंकराचार्य का अभिप्राय है कि जो साधक इस भेद को समझ लेता है, वह जान जाता है कि वास्तविक आत्मा कभी नहीं बदलती; परिवर्तन केवल उपाधियों में होता है।

एक दृष्टांत से इसे समझा जा सकता है—
आकाश स्वयं स्थिर और निष्क्रिय है, परंतु बादलों के चलने से ऐसा प्रतीत होता है कि आकाश भी गतिशील है। वास्तव में आकाश में कोई गति नहीं होती। उसी प्रकार आत्मा में कोई गति नहीं, परंतु शरीर और मन की क्रियाओं से उसमें गति का आभास होता है।

इस भाष्यांश में ब्रह्म के अद्वैत स्वरूप की गहनता प्रकट होती है—वह स्वयं अचल होते हुए भी उपाधियों के कारण गतिशील प्रतीत होता है। ‘एज्’ धातु के माध्यम से यह स्पष्ट किया गया है कि वास्तविक गति केवल परिवर्तनशील वस्तुओं में होती है, न कि आत्मा में। अतः जो साधक इस भेद को जान लेता है, वह आत्मा की नित्य, अचल और शुद्ध सत्ता का साक्षात्कार कर लेता है—यही मोक्ष का मार्ग है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,

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