अविद्या की निन्दा और ‘असुर्य लोक’ का स्वरूप
मूल पदांश (संशोधित रूप)
अथेदानीम् अविद्यानिन्दार्थः अयं मन्त्रः आरभ्यते—“असुर्याः”।
परमात्मस्वरूपम् अद्वयम् अपेक्ष्य देवादयः अपि असुराः।
तेषां च स्वभूताः लोकाः “असुर्याः” नाम। “नाम” शब्दः अनर्थकः निपातः।
अब यह (तीसरा) मंत्र अविद्या (अज्ञान) की निन्दा करने के लिए आरम्भ होता है—“असुर्याः”।
परमात्मा के अद्वैत स्वरूप की दृष्टि से देवता आदि भी असुर ही हैं।
उनके जो अपने-अपने लोक हैं, वे “असुर्य लोक” कहलाते हैं। यहाँ “नाम” शब्द केवल प्रयोग के लिए है, उसका विशेष अर्थ नहीं है।
ईशावास्योपनिषद् का यह तृतीय मन्त्र एक महत्वपूर्ण मोड़ प्रस्तुत करता है। जहाँ पहले के मन्त्रों में कर्म और ज्ञान के मार्गों का विवेचन था, वहीं अब यहाँ “अविद्या” अर्थात् अज्ञान की निन्दा की जा रही है। शंकराचार्य इस पद की व्याख्या करते हुए बताते हैं कि यह मन्त्र उन लोगों की स्थिति को स्पष्ट करता है, जो आत्मज्ञान से रहित हैं।
“असुर्याः”—यह शब्द सामान्यतः उन लोकों के लिए प्रयुक्त होता है, जो अन्धकारमय, दुःखपूर्ण और आध्यात्मिक दृष्टि से निम्न हैं। यहाँ “असुर” का अर्थ केवल पौराणिक राक्षस नहीं है, बल्कि वह हर व्यक्ति है, जो आत्मस्वरूप से अनभिज्ञ है और केवल भौतिक जगत में ही रमा हुआ है।
शंकराचार्य इस विचार को और गहराई देते हुए कहते हैं कि “परमात्मस्वरूपम् अद्वयम् अपेक्ष्य”—जब हम अद्वैत, एकमेव, निराकार ब्रह्म की दृष्टि से देखते हैं, तो देवता भी ‘असुर’ ही प्रतीत होते हैं। इसका आशय यह नहीं कि देवता वास्तव में हीन हैं, बल्कि यह कि जब तक आत्मज्ञान नहीं है, तब तक चाहे कोई भी स्थिति क्यों न हो—वह अज्ञान की ही श्रेणी में आती है।
“तेषां च स्वभूताः लोकाः”—ऐसे अज्ञानियों के अपने-अपने लोक होते हैं, जिन्हें “असुर्य लोक” कहा गया है। ये लोक अज्ञान, मोह और कर्मबंधन से युक्त हैं। वहाँ प्रकाश नहीं, बल्कि अन्धकार का ही आधिपत्य होता है—यह अन्धकार बाह्य नहीं, बल्कि ज्ञान के अभाव का प्रतीक है।
यहाँ “नाम” शब्द को शंकराचार्य “अनर्थक निपात” बताते हैं—अर्थात् वह केवल वाक्य की पूर्ति के लिए प्रयुक्त हुआ है, उसका कोई विशेष अर्थ नहीं है। इससे यह स्पष्ट होता है कि मुख्य बल “असुर्य लोक” के भाव पर है, न कि शब्द-शैली पर।
इस मन्त्र का उद्देश्य साधक को सावधान करना है। पहले जहाँ कर्म और ज्ञान के मार्ग बताए गए, अब यहाँ यह दिखाया जा रहा है कि यदि मनुष्य अज्ञान में ही बना रहता है, तो उसका पतन निश्चित है। वह अन्धकारमय लोकों में जाता है—अर्थात् वह अपने वास्तविक स्वरूप से और अधिक दूर होता चला जाता है।
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