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Thursday, 16 April 2026

ईशावास्योपनिषद् के तृतीय मन्त्र

ईशावास्योपनिषद् के तृतीय मन्त्र पर निबंध

ईशावास्योपनिषद् का तृतीय मन्त्र
“असुर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसाऽवृताः।
तांस्ते प्रेत्याभिगच्छन्ति ये के चात्महनो जनाः॥”

मानव जीवन की दिशा, चेतना और आध्यात्मिक पतन का अत्यन्त गम्भीर चित्र प्रस्तुत करता है। यह मन्त्र केवल परलोक का वर्णन नहीं करता, बल्कि जीवित अवस्था में ही मनुष्य की आन्तरिक स्थिति को उद्घाटित करता है।

सबसे पहले “असुर्या नाम ते लोका” का अर्थ समझना आवश्यक है। ‘असुर्य’ अर्थात् जहाँ ‘सूर्य’—प्रकाश, ज्ञान और चेतना—का अभाव हो। यहाँ ‘लोक’ बाह्य किसी भौगोलिक स्थान मात्र नहीं, बल्कि चेतना की अवस्था है। यह वह स्थिति है जहाँ अज्ञान, मोह और अविवेक का साम्राज्य होता है। इस प्रकार यह मन्त्र बताता है कि ऐसे अन्धकारमय लोक वास्तव में मनुष्य के भीतर ही निर्मित होते हैं।

अन्धेन तमसा आवृताः”—ये लोक घोर अज्ञान के अन्धकार से ढके हुए हैं। यह अज्ञान केवल बौद्धिक नहीं, बल्कि आत्मिक है—अपने वास्तविक स्वरूप (आत्मा) को न जान पाना। जब मनुष्य अपने सत्य स्वरूप को भूलकर केवल शरीर, इन्द्रियों और भोगों में ही लिप्त हो जाता है, तब वह इसी अन्धकार में जीता है। यह अन्धकार इतना गहन है कि उसमें सत्य का प्रकाश प्रवेश नहीं कर पाता।

मन्त्र का सबसे महत्त्वपूर्ण पद है—“आत्महनो जनाः”। यहाँ ‘आत्महत्या’ का अर्थ शारीरिक मृत्यु नहीं है, बल्कि आत्मा की उपेक्षा करना है। जो लोग अपने वास्तविक आत्मस्वरूप को नहीं पहचानते, जो केवल भौतिक सुखों, अहंकार और अज्ञान में लिप्त रहते हैं, वे ‘आत्महन्ता’ कहलाते हैं। वे अपने ही आत्मिक विकास का नाश करते हैं। यह एक सूक्ष्म और गम्भीर चेतावनी है कि मनुष्य स्वयं अपने पतन का कारण बन सकता है।

तांस्ते प्रेत्य अभिगच्छन्ति”—ऐसे लोग मृत्यु के बाद उन्हीं अन्धकारमय लोकों को प्राप्त होते हैं। इसका गूढ़ अर्थ यह है कि जैसा जीवन, वैसी ही चेतना और वैसा ही फल। यदि जीवन अज्ञान, मोह और आत्मविस्मृति में व्यतीत होता है, तो उसका परिणाम भी अन्धकारमय ही होगा। यहाँ ‘प्रेत्य’ (मरणोपरान्त) का तात्पर्य केवल मृत्यु के बाद नहीं, बल्कि प्रत्येक क्षण की चेतनात्मक परिणति से भी है—हर क्षण हम अपने लिए या तो प्रकाश का मार्ग बना रहे होते हैं या अन्धकार का।

इस मन्त्र का गहरा दार्शनिक सन्देश यह है कि मनुष्य को अपने भीतर के प्रकाश—आत्मज्ञान—की ओर उन्मुख होना चाहिए। यदि वह केवल बाह्य जगत् में उलझा रहता है, तो वह ‘असुर्य लोक’ में ही जीवन बिताता है। यह अवस्था आधुनिक जीवन में भी स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है, जहाँ भौतिक प्रगति के बावजूद मानसिक अशान्ति, उद्देश्यहीनता और आन्तरिक शून्यता बढ़ती जा रही है।

अतः यह मन्त्र केवल भय उत्पन्न करने के लिए नहीं, बल्कि जागरण का आह्वान है। यह हमें चेतावनी देता है कि आत्मा की उपेक्षा ही वास्तविक ‘आत्महत्या’ है, और आत्मज्ञान की ओर अग्रसर होना ही जीवन का परम कर्तव्य।

निष्कर्षतः, ईशावास्योपनिषद् का यह तृतीय मन्त्र हमें यह सिखाता है कि मनुष्य का वास्तविक पतन बाह्य परिस्थितियों से नहीं, बल्कि आन्तरिक अज्ञान से होता है। जो आत्मा को नहीं जानता, वह अन्धकार में ही भटकता है; और जो आत्मज्ञान प्राप्त करता है, वही सच्चे अर्थों में प्रकाश की ओर अग्रसर होता है।

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