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Thursday, 16 April 2026

ईशावास्योपनिषद् का द्वितीय मन्त्र — कर्म, जिजीविषा और संन्यास का समन्वित दर्शन

ईशावास्योपनिषद् का द्वितीय मन्त्र — कर्म, जिजीविषा और संन्यास का समन्वित दर्शन

ईशावास्योपनिषद् का द्वितीय मन्त्र—“कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः…”—मानव जीवन के स्वरूप, उसके कर्तव्य और उसके अंतिम लक्ष्य का अत्यंत गूढ़ और संतुलित निरूपण करता है। यह मन्त्र न केवल कर्म करने का उपदेश देता है, बल्कि यह भी स्पष्ट करता है कि जीवन की कामना किस प्रकार और किन शर्तों पर उचित है।

इस मन्त्र के अनुसार मनुष्य का जीवन सीमित है—अधिकतम सौ वर्षों का। इस सीमित जीवन में यदि मनुष्य जीने की इच्छा रखता है, तो उसे “कुर्वन्नेव”—अर्थात् निरंतर कर्म करते हुए ही जीना चाहिए। यहाँ कर्म का अर्थ केवल सामान्य क्रियाओं से नहीं, बल्कि शास्त्रविहित कर्मों से है—जैसे अग्निहोत्र, यज्ञ, दान आदि। यह कर्ममार्ग उस व्यक्ति के लिए है, जो “नरमात्राभिमानी” है—अर्थात् जो अपने को केवल शरीर मानता है और अभी आत्मज्ञान की स्थिति तक नहीं पहुँचा है।

शास्त्र स्पष्ट करते हैं कि ऐसे व्यक्ति के लिए कर्म से बचने का कोई अन्य उपाय नहीं है—“अन्यथा प्रकारान्तरं नास्ति।” यदि वह कर्म नहीं करेगा, तो उसका जीवन अव्यवस्थित और अधर्ममय हो जाएगा। परंतु यदि वह शास्त्रानुसार कर्म करता है, तो “कर्मणा न लिप्यते”—वह कर्म के बंधन में नहीं पड़ता। यहाँ कर्म का रहस्य यह है कि कर्तव्यभाव से, फलासक्ति का त्याग करके किया गया कर्म बंधनकारक नहीं होता।

इसके साथ ही एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है—जब उपनिषद् के प्रथम मन्त्र में “त्याग” और “संन्यास” का उपदेश है—“तेन त्यक्तेन भुञ्जीथाः”—तो फिर द्वितीय मन्त्र में कर्म का उपदेश क्यों? क्या यह विरोधाभास नहीं है?

भाष्यकार इस शंका का समाधान करते हुए बताते हैं कि यहाँ कोई विरोध नहीं, बल्कि “अधिकारभेद” है। जो व्यक्ति आत्मज्ञान के योग्य है, वैराग्य से संपन्न है, उसके लिए “ज्ञाननिष्ठा” अर्थात् संन्यासमार्ग है। वहीं जो अभी उस स्तर तक नहीं पहुँचा—“तदशक्त”—उसके लिए “कर्मनिष्ठा” का विधान है। इस प्रकार उपनिषद् दोनों मार्गों को स्वीकार करता है, परंतु उन्हें अलग-अलग पात्रों के लिए नियोजित करता है।

वेदों में भी यही कहा गया है कि दो ही मार्ग हैं—“प्रवृत्तिलक्षणो धर्मः” और “निवृत्तिलक्षणः।” प्रवृत्ति मार्ग कर्म और कर्तव्य का मार्ग है, जबकि निवृत्ति मार्ग त्याग और आत्मज्ञान का। प्रवृत्ति मार्ग साधक को चित्तशुद्धि प्रदान करता है, जिससे वह आगे चलकर निवृत्ति मार्ग के योग्य बनता है।

तैत्तिरीय श्रुति में “न्यास एव अत्यरेचयत्”—संन्यास की श्रेष्ठता का प्रतिपादन किया गया है। इससे यह स्पष्ट होता है कि यद्यपि कर्ममार्ग आवश्यक है, तथापि उसका उद्देश्य अंततः साधक को उस स्थिति तक पहुँचाना है, जहाँ वह संन्यास और आत्मज्ञान के मार्ग को ग्रहण कर सके।

इस प्रकार, ईशावास्योपनिषद् का द्वितीय मन्त्र एक समन्वित दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है। यह न तो कर्म का पूर्ण निषेध करता है, न ही केवल त्याग का आग्रह करता है। बल्कि यह बताता है कि जीवन के विभिन्न स्तरों पर मनुष्य के लिए भिन्न-भिन्न साधन उपयुक्त होते हैं।

ईशावास्योपनिषद् का द्वितीय मन्त्र मानव जीवन के लिए एक व्यावहारिक और दार्शनिक मार्गदर्शन प्रदान करता है। यह सिखाता है कि जो व्यक्ति अभी संसार में रत है, उसे कर्म करते हुए ही जीवन बिताना चाहिए, और वही उसके लिए बंधनमुक्ति का साधन बन सकता है। साथ ही, यह भी संकेत देता है कि अंतिम लक्ष्य संन्यास और आत्मज्ञान है। इस प्रकार यह मन्त्र कर्म और ज्ञान, प्रवृत्ति और निवृत्ति—दोनों का सुंदर समन्वय प्रस्तुत करता है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,

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