प्रवृत्ति और निवृत्ति—वेदों में प्रतिपादित दो धर्ममार्ग
मूल पदांश (संशोधित रूप)
रेचयति—“न्यास एव अत्यरेचयत्” इति च तैत्तिरीये।
“द्वाविमौ अथ पन्थानौ यत्र वेदाः प्रतिष्ठिताः—प्रवृत्तिलक्षणो धर्मः, निवृत्तिलक्षणश्च” इत्यादि पुत्राय विचारनिष्ठया उक्तं व्यासेन वेदाचार्येण भगवता।
तस्य विभागं च अनयोः दर्शयिष्यामः॥२॥
तैत्तिरीय उपनिषद् में कहा गया है—“संन्यास ही सर्वोत्तम है।”
और यह भी कहा गया है कि दो ही मार्ग हैं, जिनमें वेद प्रतिष्ठित हैं—एक प्रवृत्ति रूप धर्म (कर्ममार्ग) और दूसरा निवृत्ति रूप धर्म (संन्यासमार्ग)। इस प्रकार का विचार वेदाचार्य भगवान् व्यास ने अपने पुत्र को समझाया है। अब हम इन दोनों का भेद स्पष्ट करेंगे।
यह अंश वेदों में प्रतिपादित दो प्रमुख मार्गों—प्रवृत्ति और निवृत्ति—का दार्शनिक निरूपण करता है। “प्रवृत्ति” का अर्थ है संसार में प्रवृत्त होकर कर्म करना, जबकि “निवृत्ति” का अर्थ है संसार से विरक्त होकर आत्मज्ञान की ओर अग्रसर होना।
तैत्तिरीय उपनिषद् का वचन—“न्यास एव अत्यरेचयत्”—यह संकेत करता है कि संन्यास, अर्थात् त्याग, को अत्यंत उच्च स्थान प्राप्त है। यहाँ “न्यास” का अर्थ केवल बाह्य त्याग नहीं, बल्कि अहंकार, ममता और आसक्ति का आंतरिक परित्याग है। यह निवृत्ति मार्ग का मूल तत्त्व है।
इसके साथ ही यह भी कहा गया है कि वेदों में दो ही पथ प्रतिष्ठित हैं—प्रवृत्ति और निवृत्ति। प्रवृत्ति मार्ग में मनुष्य अपने कर्तव्यों का पालन करता है—जैसे यज्ञ, दान, तप आदि। यह मार्ग उन लोगों के लिए है, जो अभी संसार में सक्रिय हैं और अपने कर्तव्यों के माध्यम से आत्मशुद्धि प्राप्त करना चाहते हैं।
दूसरी ओर, निवृत्ति मार्ग उन लोगों के लिए है, जो वैराग्य को प्राप्त हो चुके हैं और अब आत्मज्ञान की खोज में हैं। वे बाह्य कर्मों का त्याग कर, अंतर्मुख होकर आत्मा के स्वरूप का साक्षात्कार करने का प्रयास करते हैं।
यहाँ यह भी उल्लेख है कि इस गूढ़ विषय को भगवान् वेदव्यास ने अपने पुत्र (शुकदेव) को समझाया था। इसका तात्पर्य यह है कि यह शिक्षण केवल सैद्धांतिक नहीं, बल्कि परंपरा से प्राप्त, अनुभूत और प्रमाणित ज्ञान है।
अंत में यह कहा गया है कि इन दोनों मार्गों का “विभाग” अर्थात् भेद आगे स्पष्ट किया जाएगा। इसका उद्देश्य यह है कि साधक यह समझ सके कि उसकी योग्यता (अधिकार) के अनुसार कौन-सा मार्ग उसके लिए उपयुक्त है।
यह अंश स्पष्ट करता है कि वेदों में जीवन के लिए दो ही मार्ग बताए गए हैं—प्रवृत्ति और निवृत्ति। प्रवृत्ति मार्ग कर्म और कर्तव्य का मार्ग है, जबकि निवृत्ति मार्ग त्याग और आत्मज्ञान का। यद्यपि दोनों का अपना-अपना महत्व है, तथापि उच्चतम आध्यात्मिक दृष्टि से निवृत्ति मार्ग को अधिक श्रेष्ठ माना गया है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,
No comments:
Post a Comment