टूटी कुर्सी
1
टूटी कुर्सी
कोने में पड़ी है,
जैसे कोई बात
अधूरी रह गई हो।
2
एक पाया डगमगाता है,
फिर भी खड़ी है—
जैसे ज़िद
अब भी बाकी हो।
3
उस पर बैठने वाले
कितने लोग बदले,
पर उसकी जगह
वहीं की वहीं रही।
4
पीठ का सहारा
थोड़ा झुक गया है,
जैसे समय ने
धीरे से दबा दिया हो।
5
कभी उस पर
लंबी बातें होती थीं,
अब सन्नाटा
वहीं बैठा रहता है।
6
लकड़ी की दरारों में
पुरानी आवाज़ें फँसी हैं,
जो छूने पर
हल्की-सी गूंज उठती हैं।
7
कोई बैठता है तो
चरमराती है,
जैसे शिकायत
धीरे से निकल आई हो।
8
फेंकी नहीं गई अभी,
शायद उम्मीद है
कि कोई
इसे फिर ठीक करेगा।
9
टूटी है,
पर बेकार नहीं
बस थोड़ा-सा
समय चाहिए।
10
टूटी कुर्सी—
थके हुए दिनों का
वो ठिकाना,
जो अब भी
सहारा देना चाहता है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,
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