छतें
1
छतें
घर की चुप आँखें हैं,
सब देखती हैं,
कुछ कहती नहीं।
2
दोपहर में तपती हैं,
रात में ठंडी हो जाती हैं,
जैसे दिन-भर की बातें
खुद में समेट लेती हों।
3
कभी बच्चों की दौड़,
कभी कपड़ों की सरसराहट
हर आवाज़
यहीं ठहरती है।
4
शाम को
कोई टहलता है,
और आसमान
थोड़ा पास आ जाता है।
5
कोनों में
पुरानी चीज़ें पड़ी हैं,
जैसे यादें
धूप में सूख रही हों।
6
कभी-कभी
वो गवाह बनती हैं,
दो लोगों की
धीमी-सी बातों की।
7
बरसात में
भीगती रहती हैं,
जैसे दुख
बिना छतरी के गुजर रहा हो।
8
रात को
तारे उतर आते हैं,
और छत
आसमान बन जाती है।
9
सुबह की पहली धूप
सबसे पहले
उन्हीं पर उतरती है।
10
छतें
घर के ऊपर नहीं,
उसकी खामोश यादों के
सबसे करीब होती हैं।
मुकेश ,,,,,,,,,,,
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