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Tuesday, 14 April 2026

वो बिना पूछे जान लेती है

 वो बिना पूछे जान लेती है

और मैं पूछकर भी नहीं जान पाता।


मैं सवाल करता हूँ

सही शब्दों में,

सही समय पर,

पूरी नीयत के साथ

पर जवाब

मेरे हाथ नहीं आते।


वो कुछ नहीं पूछती

बस देखती है,

ठहरती है,

और समझ लेती है।


मैं अर्थ ढूँढ़ता हूँ

हर बात में,

हर लफ़्ज़ में

वो

लफ़्ज़ों के बिना ही

मायने पा लेती है।


मैं कहता हूँ

“बताओ न…”

वो मुस्कुरा देती है

और उसी में

सब कुछ कह देती है।


कभी-कभी लगता है

मैं सुनता ज़्यादा हूँ,

समझता कम हूँ

और वो

समझती ज़्यादा है,

कहती कम है।


हम दोनों

एक ही जगह खड़े हैं

पर रास्ते अलग हैं।


वो बिना पूछे जान लेती है,

और मैं

पूछकर भी

नहीं जान पाता।


शायद समझ

सवालों से नहीं,

सन्नाटों से आती है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,

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