साठ वर्ष की स्त्री का प्रेम
साठ वर्ष की स्त्री का प्रेम
कोई आकस्मिक ज्वाला नहीं होता
वह एक दीर्घ साधना का प्रसाद होता है।
उसके भीतर अब
उत्साह का उफान कम,
और समझ का गहरापन अधिक होता है।
वह प्रेम में “पाना” नहीं खोजती,
बल्कि “होना” जानती है।
उसका प्रेम
अब किसी की आँखों की चमक पर नहीं ठहरता,
वह मन की थकान पहचान लेता है,
बिना कहे हुए शब्दों को सुन लेता है,
और बिना छुए ही सहला देता है।
साठ वर्ष की स्त्री
प्रेम को प्रमाणों में नहीं बाँधती—
न उसे रोज़ के इज़हार की ज़रूरत होती है,
न ही आश्वासनों की।
वह जानती है कि
साथ होना ही सबसे बड़ा कथन है।
उसका प्रेम
धीमी आँच पर पका हुआ वह स्वाद है
जो जल्दी में समझ नहीं आता।
वह प्रतीक्षा कर सकता है,
त्याग कर सकता है,
और सबसे बढ़कर—
स्वीकार कर सकता है।
अब उसमें अधिकार कम,
आश्रय अधिक होता है।
वह प्रेम को बाँधती नहीं,
बस उसके लिए एक खुला आकाश बन जाती है।
साठ वर्ष की स्त्री का प्रेम
शब्दों से कम,
और मौन से अधिक व्यक्त होता है—
जहाँ एक चुप्पी में भी
पूरा जीवन बोलता है।
और शायद यही कारण है कि
उसका प्रेम
युवावस्था की चंचलता से नहीं,
बल्कि एक गहरी शांति से चमकता है
जैसे सांझ का आकाश,
जिसमें दिन की सारी थकान घुलकर
एक सुंदर विराम बन जाती है।
मुकेश ,,,,,,,,,
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