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Monday, 20 April 2026

प्रवृत्ति–निवृत्ति वेदार्थ का ग्रन्थानुसार विभाजन — “प्रकाशितः…” पद का निबंधात्मक विवेचन

 प्रवृत्ति–निवृत्ति वेदार्थ का ग्रन्थानुसार विभाजन — “प्रकाशितः…” पद का निबंधात्मक विवेचन

मूल पदांश (संशोधित रूप में)

प्रकाशितः। तत्र प्रवृत्ति-लक्षणस्य वेदार्थस्य— विधि-निषेध-लक्षणस्य कृत्स्नस्य प्रकाशने ब्राह्मणम् उपयुक्तम्।

निवृत्ति-लक्षणस्य प्रकाशने अत ऊर्ध्वं बृहदारण्यकम् उपयुक्तम्।

तत्र निषेधादि…


यह भाष्यांश वेद के सम्पूर्ण तात्पर्य को न केवल दार्शनिक रूप में, बल्कि ग्रन्थ-विन्यास (textual structure) के स्तर पर भी स्पष्ट करता है। आदि शंकराचार्य यहाँ यह दिखाते हैं कि वेद के दो प्रमुख पक्ष— प्रवृत्ति और निवृत्ति— केवल विचार नहीं हैं, बल्कि वेद के विभिन्न भागों में सुव्यवस्थित रूप से व्यक्त हुए हैं।


“प्रवृत्ति-लक्षणस्य वेदार्थस्य…” — कर्मप्रधान क्षेत्र

शंकराचार्य कहते हैं—

प्रवृत्ति-लक्षण वेदार्थ

वह है जो—

विधि (क्या करना चाहिए)

निषेध (क्या नहीं करना चाहिए)


इनके माध्यम से व्यक्त होता है।

यह क्षेत्र—

यज्ञ, दान, अनुष्ठान

सामाजिक और धार्मिक कर्तव्य

धर्म की व्यवस्था


इन सबका विधान करता है।

“कृत्स्नस्य प्रकाशने” — सम्पूर्ण कर्मकाण्ड


“कृत्स्न” का अर्थ है—

सम्पूर्ण, पूर्णतः


अर्थात्—

कर्म और आचरण से सम्बन्धित समस्त शिक्षाएँ


इनका पूर्ण निरूपण—

ब्राह्मण-ग्रन्थों में किया गया है


“ब्राह्मणम् उपयुक्तम्” — ग्रन्थ का स्थान

वेद के ब्राह्मण-भाग—


यज्ञ-विधि का विस्तार

कर्मों की सूक्ष्म प्रक्रिया

विधि और निषेध का विवेचन


इन सबका विस्तृत वर्णन करते हैं।

अतः—

प्रवृत्ति-मार्ग को समझने के लिए

ब्राह्मण-ग्रन्थ सर्वाधिक उपयुक्त हैं


“निवृत्ति-लक्षणस्य…” — ज्ञानप्रधान क्षेत्र

इसके विपरीत—

निवृत्ति-लक्षण वेदार्थ

वह है—

जहाँ कर्म का त्याग

आत्मा का साक्षात्कार

अद्वैत का बोध


प्रतिपादित होता है।

“अत ऊर्ध्वं…” — उच्चतर स्तर

“अत ऊर्ध्वं” का अर्थ है—

इससे ऊपर, उच्चतर स्तर पर


अर्थात्—

प्रवृत्ति के पार जो क्षेत्र है

वह निवृत्ति का क्षेत्र है


“बृहदारण्यकम् उपयुक्तम्” — ज्ञान का शिखर

यहाँ शंकराचार्य विशेष रूप से बृहदारण्यक उपनिषद् का उल्लेख करते हैं।

यह उपनिषद्—

आत्मज्ञान का गहनतम विवेचन

“नेति नेति” का सिद्धान्त

असंग आत्मा का प्रतिपादन


इन सबका विस्तृत निरूपण करता है।

अतः—

निवृत्ति-मार्ग के प्रकाशन के लिए

यह अत्यन्त उपयुक्त है


“तत्र निषेधादि…” — निवृत्ति की विधि

निवृत्ति मार्ग में “निषेध” का विशेष स्थान है—

“नेति नेति” (यह नहीं, यह नहीं)

आत्मा का निरूपण नकार के माध्यम से

यहाँ—

जो कुछ भी अनात्म है, उसका निषेध किया जाता है


ताकि—

शुद्ध आत्मा प्रकट हो सके


दार्शनिक समन्वय

यह भाष्यांश यह दिखाता है कि—

वेद केवल एक दिशा नहीं देता


बल्कि—

पहले कर्म (प्रवृत्ति) सिखाता है

फिर ज्ञान (निवृत्ति) की ओर ले जाता है

क्रम का महत्व

ब्राह्मण (प्रवृत्ति)

→ चित्तशुद्धि

→ अनुशासन

उपनिषद् (निवृत्ति)

→ आत्मज्ञान

→ मुक्ति

दृष्टांत


जैसे—

विद्यालय में पहले नियम और अभ्यास सिखाए जाते हैं,

फिर उच्च स्तर पर स्वतंत्र चिंतन—


उसी प्रकार—

वेद पहले कर्म सिखाता है,

फिर आत्मज्ञान।


इस शांकरभाष्यांश में आदि शंकराचार्य यह स्पष्ट करते हैं कि—

वेद का प्रवृत्ति-भाग (विधि–निषेध) ब्राह्मण-ग्रन्थों में पूर्ण रूप से व्यक्त होता है,

और निवृत्ति-भाग (आत्मज्ञान) उपनिषदों—विशेषतः बृहदारण्यक उपनिषद्—में।


अतः—

वेद एक समन्वित यात्रा है—

कर्म से ज्ञान की ओर,

प्रवृत्ति से निवृत्ति की ओर,

और अंततः बन्धन से मुक्ति की ओर।


मुकेश ,,,,,,,,

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