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Monday, 20 April 2026

एतावती संसारगतिः…” — प्रवृत्ति–निवृत्ति के द्विप्रकार वेदार्थ का निबंधात्मक विवेचन

एतावती संसारगतिः…” — प्रवृत्ति–निवृत्ति के द्विप्रकार वेदार्थ का निबंधात्मक विवेचन

मूल पदांश (संशोधित रूप में)


एतावती संसारगतिः।

अतः परं पूर्वोक्तम्— “आत्मा एव अभिजानीयात्” इति;

सर्व-असंबन्ध-भाव एव स्वभाव-संन्यास-ज्ञान-निष्ठा-फलम्।

एवं द्विप्रकारः— प्रवृत्ति-निवृत्ति-लक्षणः वेदार्थः उक्तः॥

ईशावास्योपनिषद् के मन्त्रों का जो क्रम अब तक चला— कर्म, उपासना, विद्या-अविद्या, संभूति-असंभूति, विनाश-अमृत— उसका यह समापन-विचार है। आदि शंकराचार्य इस पद में यह स्पष्ट करते हैं कि इन समस्त साधनों का क्षेत्र “संसारगति” तक ही सीमित है; और इसके पार जो तत्त्व है, वह केवल आत्मज्ञान द्वारा ही उपलब्ध होता है।

“एतावती संसारगतिः” — साधन की परिधि

“एतावती” का अर्थ है—

“यहीं तक”, “इतनी ही सीमा तक”

अर्थात्—

यज्ञ, दान, कर्म

देवता-उपासना

हिरण्यगर्भ की प्राप्ति

प्रकृतिलय

इन सबका फल चाहे कितना ही ऊँचा क्यों न हो

वह संसार के भीतर ही है

इसलिए

यह सब “संसारगति” है, न कि अंतिम मुक्ति।

“अतः परम्…” — दिशा का परिवर्तन

अब शंकराचार्य साधक को एक निर्णायक मोड़ पर लाते हैं—

“अतः परम्” — अब इसके आगे

यहाँ वे उपनिषद् के परम वाक्य की ओर संकेत करते हैं—

“आत्मा एव अभिजानीयात्”

(आत्मा को ही जानना चाहिए)

यहाँ से साधना का चरित्र बदल जाता है—


बाह्य से आन्तरिक

कर्तृत्व से साक्षित्व

साधन से साध्य

“सर्व-असंबन्ध-भाव” — अद्वैत की स्थिति


आत्मज्ञान का फल क्या है?

“सर्व-असंबन्ध-भाव”

अर्थात्—

किसी भी वस्तु से वास्तविक सम्बन्ध नहीं

न कर्ता, न भोक्ता

न बन्धन, न मोक्ष


यह पूर्ण असंगता है

जहाँ आत्मा अपने शुद्ध स्वरूप में स्थित होती है।


“स्वभाव-संन्यास” — सहज त्याग


यहाँ “संन्यास” का अर्थ बाह्य वेश या कर्म-त्याग मात्र नहीं है, बल्कि—

स्वभाव-संन्यास

अर्थात्—

“मैं करता हूँ” इस अहंकार का लोप

“यह मेरा है” इस आसक्ति का त्याग


और यह त्याग—

ज्ञान के उदय से स्वाभाविक हो जाता है


“ज्ञान-निष्ठा-फलम्” — अंतिम सिद्धि

इस मार्ग का फल है—

ज्ञान-निष्ठा

आत्मा में स्थित रहना

द्वैत का लय

ब्रह्मस्वरूप की स्थिर अनुभूति


यही—

मोक्ष है


“द्विप्रकारः वेदार्थः” — वेद का समग्र स्वरूप

शंकराचार्य यहाँ वेद के सम्पूर्ण अर्थ को दो भागों में विभाजित करते हैं—

1. प्रवृत्ति-लक्षण वेदार्थ

कर्म

उपासना

धर्म-पालन

चित्तशुद्धि


यह साधक को तैयार करता है


2. निवृत्ति-लक्षण वेदार्थ

आत्मज्ञान

संन्यास

अद्वैत अनुभूति


यह साधक को मुक्त करता है

दोनों का सम्बन्ध

प्रवृत्ति → साधन

निवृत्ति → साध्य


प्रवृत्ति के बिना—

चित्त शुद्ध नहीं होता


निवृत्ति के बिना—

मुक्ति नहीं होती


दार्शनिक निष्कर्ष

यह पद एक अत्यन्त निर्णायक सत्य स्थापित करता है—


कर्म और उपासना का क्षेत्र सीमित है

आत्मज्ञान का क्षेत्र असीम है


अतः—

संसार में जितनी भी उपलब्धियाँ हैं, वे “एतावती” हैं— सीमित;

परन्तु आत्मज्ञान “अतिरिक्त” है— जो सब सीमाओं के पार है।


इस शांकरभाष्यांश में आदि शंकराचार्य यह निष्कर्ष देते हैं कि—


साधना के सभी पूर्व चरण आवश्यक हैं,

किन्तु वे अंतिम नहीं हैं।

अंततः—

आत्मा को जानना ही लक्ष्य है,

जहाँ सभी सम्बन्ध मिट जाते हैं,

और केवल शुद्ध अस्तित्व शेष रहता है।


यही—

वेदान्त का परम और अंतिम अभिप्राय है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,


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