“मनुष्य–देव–वित्तसाध्यं फलम्…” — शास्त्रसम्मत कर्मफल और उसकी सीमा
मूल पदांश (संशोधित रूप में)
मनुष्य–देव–वित्तसाध्यं फलम्;
शास्त्ररक्षणं, प्रीति-ख्याति-आदि अन्तम्॥
यह पदांश उस कर्मफल की सीमा को उद्घाटित करता है, जो मनुष्य-जीवन में, देवताओं की आराधना में और वित्त (धन) के द्वारा संपादित साधनों में प्राप्त होता है। यहाँ संकेत यह है कि कर्म और उपासना से जो फल प्राप्त होते हैं, वे यद्यपि शास्त्रसम्मत और उपयोगी हैं, तथापि वे सीमित और अन्तवत्त्वयुक्त होते हैं।
“मनुष्य–देव–वित्तसाध्यं फलम्” — कर्मफल का क्षेत्र
इस पद में तीन स्तरों का उल्लेख है—
मनुष्य-साध्य
लौकिक कर्म
सामाजिक सफलता
प्रतिष्ठा, सुख, व्यवस्था
देव-साध्य
यज्ञ, उपासना
देवताओं की प्रसन्नता
स्वर्गादि लोकों की प्राप्ति
वित्त-साध्य
धन के माध्यम से किए गए कर्म
दान, यज्ञ, भौतिक उपक्रम
इन तीनों से प्राप्त फल—
शास्त्र द्वारा मान्य हैं
किन्तु साधन-जन्य हैं
“शास्त्ररक्षणम्” — कर्म का औचित्य
यहाँ एक महत्वपूर्ण पक्ष यह है—
ये कर्म “शास्त्ररक्षण” करते हैं
अर्थात्—
समाज में धर्म की स्थापना
वेद-विहित आचरण का पालन
परंपरा का संरक्षण
इस प्रकार—
कर्म केवल व्यक्तिगत लाभ नहीं,
बल्कि धार्मिक व्यवस्था का आधार भी है
“प्रीति–ख्याति–अन्तम्” — फल की सीमा
यहाँ “अन्त” शब्द अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है—
इन कर्मों का फल अंततः सीमित है
वे क्या देते हैं?
प्रीति — संतोष, सुख, आनंद
ख्याति — यश, प्रतिष्ठा, सम्मान
किन्तु—
ये सब क्षणभंगुर हैं
फल की सीमितता का कारण
कर्मजन्य फल सीमित क्यों हैं?
क्योंकि— वे काल के अधीन हैं
वे साधन पर निर्भर हैं
वे परिवर्तनशील हैं
अतः—
उनका आरम्भ है
और उनका अन्त भी है
दार्शनिक संकेत
यह पद साधक को यह समझाता है कि—
कर्म और उपासना आवश्यक हैं,
परन्तु—
वे अंतिम लक्ष्य नहीं हैं
वे—
चित्तशुद्धि देते हैं
व्यवस्था बनाए रखते हैं
साधना का आधार बनते हैं
किन्तु—
मोक्ष नहीं देते
पूर्व प्रसंग से सम्बन्ध
ईशावास्योपनिषद् के पूर्व मन्त्रों में—
कर्म (अविद्या)
उपासना (विद्या)
संभूति–असंभूति
इन सबका विवेचन हुआ है।
यह पद उसी का निष्कर्ष प्रस्तुत करता है—
इन सबके फल सीमित हैं
दृष्टांत
जैसे—
कोई व्यक्ति धन, यश और सुख प्राप्त कर ले,
परन्तु अन्ततः वे सब समाप्त हो जाते हैं—
उसी प्रकार—
कर्मजन्य फल स्थायी नहीं होते
इस पदांश का सार यह है कि—
मनुष्य, देवता और धन के द्वारा जो भी फल प्राप्त होते हैं,
वे शास्त्रसम्मत होते हुए भी—
प्रीति और ख्याति तक सीमित हैं
अतः—
वे साधना के मार्ग में सहायक हैं,
परन्तु अंतिम लक्ष्य नहीं।
साधक को इनका सम्मान करते हुए भी—
इनसे आगे बढ़कर
आत्मज्ञान की ओर अग्रसर होना चाहिए।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,
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