“विनाशेन मृत्युं तीर्त्वा…” — शांकरभाष्य का समन्वित रहस्य (चतुर्दश मन्त्र)
मूल पदांश (संशोधित रूप में)
**न उच्यते— “न अञ्च” इति।
तेन तदुपासनेन अनैश्वर्यम् अधमं कामादि-दोषजातं च मृत्युं तीर्त्वा;
हिरण्यगर्भोपासनेन तु अणिमा-आदि-प्राप्तिः।
ततः तेन अनैश्वर्यादि-मृत्युं अतीत्य, असंभूत्याः (अव्याकृतोपासनया)
अव्याकृत-प्रकृतिलय-लक्षणम् अमृतम् अश्नुते।
“संभूतिं च विनाशं च” इत्यत्र अवग्रह-लोपेन निर्देशः द्रष्टव्यः—
प्रकृतिः इति श्रुति-अनुरोधात्॥१४॥**
ईशावास्योपनिषद् के चतुर्दश मन्त्र पर आदि शंकराचार्य का यह भाष्यांश अत्यन्त सूक्ष्म व्याख्या प्रस्तुत करता है, जहाँ “विनाश” और “संभूति” के पारस्परिक संबंध, उनके साधन तथा उनके फल को गहन विश्लेषण के साथ स्पष्ट किया गया है। यहाँ शंकराचार्य न केवल शब्दार्थ बताते हैं, बल्कि साधना के क्रम (process) को भी खोलकर रखते हैं।
“न उच्यते— न अञ्च” — प्रत्यक्ष निषेध नहीं
शंकराचार्य प्रारम्भ में यह स्पष्ट करते हैं कि—
यहाँ किसी एक साधन का निषेध नहीं किया गया है
“न अञ्च” का संकेत है—
यह वाक्य किसी एक को छोड़ने के लिए नहीं है
अर्थात्—
यह समुच्चय-प्रधान शिक्षा है
“तदुपासनेन… अनैश्वर्यं मृत्युं तीर्त्वा”
यहाँ “विनाश” या “असंभूति” की उपासना का फल बताया गया है—
“अनैश्वर्य” — अर्थात्
हीन अवस्था
काम, क्रोध आदि दोषों से युक्त जीवन
इसे ही शंकराचार्य “मृत्यु” कहते हैं।
अब—
उस उपासना के द्वारा
यह अधम अवस्था
यह दोषसमूह
अतिक्रमित किया जाता है।
अर्थात्—
साधक पहले अपने निम्नतर बन्धनों से मुक्त होता है।
“हिरण्यगर्भोपासनेन… अणिमादि-प्राप्तिः”
इसके पश्चात्—
“संभूति” अर्थात् हिरण्यगर्भ की उपासना से
अणिमा
लघिमा
अन्य ऐश्वर्य
की प्राप्ति होती है।
यह,एक उच्चतर अवस्था है
परन्तु अभी भी साधन का ही भाग है
साधना का क्रम (Spiritual Progression)
यहाँ एक अत्यन्त महत्वपूर्ण क्रम प्रस्तुत होता है—
असंभूति (प्रकृति) की उपासना
→ अधम दोषों (काम आदि) से मुक्ति
→ “मृत्यु” का अतिक्रमण
संभूति (हिरण्यगर्भ) की उपासना
→ ऐश्वर्य, सूक्ष्म सिद्धियाँ
अंततः
→ अव्याकृत में लय (प्रकृतिलय)
“असंभूत्याः… प्रकृतिलयलक्षणम् अमृतम्”
शंकराचार्य यहाँ एक सूक्ष्म बिन्दु बताते हैं—
अव्याकृत (प्रकृति) में लय को
“अमृत” कहा गया है
किन्तु—
यह परम मोक्ष नहीं
बल्कि—
एक विशेष अवस्था है
जहाँ साधक प्रकृति में विलीन हो जाता है
इसे ही— “प्रकृतिलय” कहा जाता है
“अवग्रह-लोपेन निर्देशः” — भाषिक सूक्ष्मता
यहाँ एक महत्वपूर्ण व्याकरणिक संकेत दिया गया है—
“संभूतिं च विनाशं च” इसमें—
“असंभूति” का निर्देश
“विनाश” शब्द के माध्यम से किया गया है
अर्थात्—
यहाँ “विनाश” = “असंभूति” (प्रकृति)
यह व्याख्या— अन्य श्रुतियों के अनुरूप है
दार्शनिक गहराई
यह भाष्यांश एक अत्यन्त गहरी बात को उजागर करता है—
साधना एक क्रम है,
जहाँ निम्नतर से उच्चतर की ओर बढ़ना होता है
पहले दोषों का त्याग
फिर ऐश्वर्य की प्राप्ति
और अंततः कारण में लय
किन्तु—
यह सब अभी भी परम ब्रह्मज्ञान से पूर्व की अवस्थाएँ हैं
दृष्टांत
जैसे—
कोई व्यक्ति पहले रोग से मुक्त हो (दोष-नाश),
फिर बलवान बने (ऐश्वर्य),
और फिर विश्राम की अवस्था में जाए—
उसी प्रकार—
साधक भी क्रमशः उन्नति करता है
इस शांकरभाष्यांश में आदि शंकराचार्य यह स्पष्ट करते हैं कि—
“विनाश” (असंभूति) की उपासना से साधक अधम दोषों को पार करता है
“संभूति” (हिरण्यगर्भ) की उपासना से ऐश्वर्य प्राप्त करता है
और अंततः प्रकृतिलय को प्राप्त होता है
अतः—
समुच्चय ही साधना का क्रम है,
और यही क्रम साधक को क्रमशः उच्चतर अवस्थाओं की ओर ले जाता है।
किन्तु अंतिम संकेत यही है—
इन सबके पार ही वास्तविक आत्मज्ञान स्थित है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,,,,
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