“विनाशेन…” पद का शांकरार्थ — नश्वर-धर्म के अतिक्रमण का निबंधात्मक विवेचन
मूल पदांश (संशोधित रूप में)
विनाशेन — विनाशधर्मणा;
विनाशः धर्मः यस्य कार्यस्य सः (विनाशधर्मा कार्यः), तेन;
धर्मिणः अभेदेन (उपासनया)…
ईशावास्योपनिषद् के चतुर्दश मन्त्र में प्रयुक्त “विनाशेन मृत्युं तीर्त्वा” इस वाक्यांश का आदि शंकराचार्य द्वारा किया गया यह सूक्ष्म भाष्य, “विनाश” शब्द के वास्तविक तात्पर्य को स्पष्ट करता है। यहाँ “विनाश” केवल साधारण नाश नहीं, बल्कि एक विशेष धर्म (स्वभाव) के रूप में समझाया गया है— जो कार्य-जगत् की अनिवार्य विशेषता है।
“विनाशधर्मा” — नश्वरता ही स्वभाव
शंकराचार्य स्पष्ट करते हैं—
“विनाश” उस तत्त्व को सूचित करता है
जिसका स्वभाव ही नाश है
अर्थात्—
जो उत्पन्न हुआ है, वह नष्ट होगा
जो कार्य (व्यक्त) है, वह क्षयशील है
इस प्रकार—
समस्त कार्य-जगत् “विनाशधर्मा” है
“धर्मो यस्य कार्यस्य” — कार्य-ब्रह्म की स्थिति
यहाँ “कार्य” का अर्थ है
प्रकट सृष्टि, कार्य-ब्रह्म
जिसका स्वभाव
परिवर्तन और नाश है
अतः—
इस कार्य-जगत् का ज्ञान
उसकी सीमाओं का ज्ञान है
“तेन” — उसी के द्वारा अतिक्रमण
अब प्रश्न उठता है—
उसी “विनाशधर्मा” वस्तु के द्वारा मृत्यु का अतिक्रमण कैसे?
उत्तर है—
“तेन” — उसी के माध्यम से
अर्थात्—
नश्वरता का ज्ञान
नाशवान तत्त्व का बोध
साधक को यह समझाता है कि
यह जगत् स्थायी नहीं है
“धर्मिणः अभेदेन” — उपासना की सूक्ष्म प्रक्रिया
यहाँ एक अत्यन्त गूढ़ तत्त्व है—
“धर्मिणः अभेदेन”
अर्थात्—
साधक उस कार्य (या उसके अधिष्ठाता) के साथ
अभेदभाव से उपासना करता है
यह उपासना—
केवल बाह्य नहीं
बल्कि तादात्म्य (एकत्व-बोध) की ओर ले जाने वाली है
“विनाशेन मृत्युं तीर्त्वा” — वास्तविक अर्थ
अब इस वाक्य का गूढ़ अर्थ स्पष्ट होता है—
साधक—
नश्वरता को समझकर
उससे आसक्ति हटाकर
“मृत्यु” (संसार-चक्र) को पार करता है
अर्थात्—
नाशवान में स्थायित्व की अपेक्षा समाप्त हो जाती है
दार्शनिक गहराई
यह भाष्यांश एक अत्यन्त महत्वपूर्ण सिद्धान्त को प्रकट करता है—
नश्वरता का ज्ञान ही वैराग्य का कारण है
और—
वैराग्य ही मृत्यु (संसार) के अतिक्रमण का साधन है
समुच्चय में स्थान
यहाँ “विनाश” का प्रयोग—
“संभूति” के साथ समुच्चय में है
अर्थात्—
विनाश → वैराग्य, मृत्यु-अतिक्रमण
संभूति → उपासना, उन्नति, अमृतत्व
दोनों मिलकर—
साधक को पूर्ण मार्ग प्रदान करते हैं
दृष्टांत
जैसे—
कोई व्यक्ति यह जान ले कि यह घर अस्थायी है,
तो वह उसमें अत्यधिक आसक्त नहीं होगा;
उसी प्रकार—
नश्वरता का ज्ञान
बन्धन को तोड़ता है
इस शांकरभाष्यांश में आदि शंकराचार्य यह स्पष्ट करते हैं कि “विनाश” का अर्थ केवल नाश नहीं, बल्कि नश्वरता का धर्म है, जो समस्त कार्य-जगत् में विद्यमान है।
उसी नश्वरता के बोध के द्वारा—
साधक मृत्यु (संसार) को पार करता है।
अतः—
विनाश का ज्ञान विनाशकारी नहीं,
बल्कि मुक्ति की दिशा में पहला कदम है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,,,,
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