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Sunday, 19 April 2026

समुच्चय की अनिवार्यता — “संभूतिं च विनाशं च…” पद पर शांकरभाष्य का निबंधात्मक विवेचन

 समुच्चय की अनिवार्यता — “संभूतिं च विनाशं च…” पद पर शांकरभाष्य का निबंधात्मक विवेचन

मूल पदांश (संशोधित रूप में)

यतः एवम् अतः समुच्चयः संभूति-असंभूति-उपासनयोः युक्तः, एक-पुरुषार्थत्वात् इति आह—

“संभूतिं च विनाशं च यः तत् वेद उभयं सह…”॥१४॥

ईशावास्योपनिषद् के चतुर्दश मन्त्र पर आदि शंकराचार्य का यह भाष्यांश पूर्ववर्ती मन्त्रों के समस्त तर्क का निष्कर्ष प्रस्तुत करता है। जहाँ द्वादश और त्रयोदश मन्त्रों में संभूति (कार्य) और असंभूति (कारण) की उपासनाओं की पृथक्-पृथक् निन्दा तथा उनके फलभेद का निरूपण किया गया, वहीं अब यह स्पष्ट किया जा रहा है कि इन दोनों का समुच्चय ही युक्त (उचित) है।

“यतः एवम्” — पूर्व प्रतिपादन का निष्कर्ष

“यतः एवम्” का अर्थ है—

 क्योंकि पूर्व में यह सिद्ध हो चुका है कि


दोनों उपासनाओं के फल भिन्न हैं

दोनों में एकांगी आसक्ति अज्ञान का कारण है

अतः—

अब निष्कर्ष रूप में कहा जा रहा है—

“समुच्चयः… युक्तः” — संयुक्त साधना का औचित्य

शंकराचार्य कहते हैं—

संभूति-असंभूति-उपासनयोः समुच्चयः युक्तः

अर्थात्—

दोनों उपासनाओं का संयोजन ही उचित है

यही साधना का सम्यक् मार्ग है


यह “युक्त” शब्द दर्शाता है—

यह केवल सम्भव नहीं,

बल्कि आवश्यक और तर्कसंगत है


“एक-पुरुषार्थत्वात्” — एक ही साधक का लक्ष्य

यहाँ एक अत्यन्त महत्वपूर्ण सिद्धान्त है—

एक-पुरुषार्थत्वात्

अर्थात्—

यह साधना किसी समूह के लिए विभाजित नहीं

बल्कि एक ही साधक के लिए है

और—

उसका लक्ष्य भी एक ही है

अतः—

वह अलग-अलग मार्गों में बँट नहीं सकता

उसे समन्वित साधना अपनानी होगी

“संभूतिं च विनाशं च” — द्वन्द्व का समावेश

यहाँ—

संभूति = कार्य-ब्रह्म (हिरण्यगर्भ)

विनाश = असंभूति (अव्याकृत, नश्वर पक्ष)

अतः—

साधक को दोनों का ज्ञान और उपासना करनी चाहिए

“उभयं सह” — समन्वय का चरम

“उभयं सह” पुनः यह स्पष्ट करता है—

दोनों को एक साथ, संतुलित रूप से अपनाना

यहाँ “सह” का अर्थ—

एक ही समय में

एक ही साधक द्वारा

एक ही लक्ष्य की ओर

दार्शनिक गहराई

यह भाष्यांश एक अत्यन्त गहरी बात स्थापित करता है—

विविध साधन, एक ही साध्य की ओर अग्रसर होते हैं

किन्तु—

यदि उन्हें अलग-अलग अपनाया जाए,

तो वे अपूर्ण रह जाते हैं

अतः—

समुच्चय ही पूर्णता का मार्ग है

समुच्चय का आन्तरिक अर्थ

यह केवल बाह्य संयोजन नहीं है, बल्कि—

कारण (असंभूति) की समझ

कार्य (संभूति) की उपासना

नश्वरता (विनाश) का बोध


इन तीनों का संतुलन—

साधक को उच्चतर सत्य की ओर ले जाता है

दृष्टांत

जैसे—

एक ही व्यक्ति को शरीर, मन और बुद्धि— तीनों का विकास करना होता है,

वैसे ही—

साधक को भी साधना के विभिन्न आयामों को समाहित करना होता है


इस शांकरभाष्यांश में आदि शंकराचार्य यह स्पष्ट करते हैं कि—

संभूति और असंभूति (या विनाश) की उपासनाओं का समुच्चय ही उचित है,

क्योंकि—

साधक एक है,

उसका लक्ष्य एक है,

और साधना भी समन्वित होनी चाहिए।

अतः—

समुच्चय ही साधना का यथार्थ स्वरूप है,

और एकांगी दृष्टि ही बन्धन का कारण।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

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