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Sunday, 19 April 2026

ईशावास्योपनिषद् — चतुर्दश मन्त्र का निबंधात्मक विवेचन (संभूति–विनाश का समुच्चय

 ईशावास्योपनिषद् — चतुर्दश मन्त्र का निबंधात्मक विवेचन (संभूति–विनाश का समुच्चय)

संभूतिं च विनाशं च यस्तद्वेदोभयं सह ।

विनाशेन मृत्युं तीर्त्वा संभूत्याऽमृतमश्नुते ॥१४॥

यः (पुरुषः) संभूतिं च विनाशं च उभयं सह वेद,

सः विनाशेन मृत्युं तीर्त्वा, संभूत्याऽमृतम् अश्नुते।

जो मनुष्य “संभूति” (कार्य-ब्रह्म, सृष्ट चेतन सत्ता) और “विनाश” (अव्यक्त/नश्वर तत्त्व, या प्रकृति का क्षयशील पक्ष)  दोनों को एक साथ जानता है, वह विनाश (नश्वरता के बोध या उससे संबंधित साधन) के द्वारा मृत्यु को पार करता है और संभूति (उपासना) के द्वारा अमृतत्व को प्राप्त करता है।

ईशावास्योपनिषद् के द्वादश और त्रयोदश मन्त्रों में “संभूति” और “असंभूति” के एकांगी उपासना की निन्दा तथा उनके फलभेद का प्रतिपादन किया गया था। वहाँ यह स्पष्ट किया गया कि

केवल असम्भूति (अव्याकृत प्रकृति) में रत रहने वाला अन्धकार में जाता है,

और केवल संभूति (कार्य-ब्रह्म) में रत रहने वाला उससे भी अधिक सूक्ष्म अज्ञान में फँस जाता है।

अब यह चतुर्दश मन्त्र उस समस्या का समाधान प्रस्तुत करता है, ठीक उसी प्रकार जैसे एकादश मन्त्र ने “विद्या–अविद्या” के प्रसंग में किया था।

“संभूतिं च विनाशं च” — द्वन्द्व का समन्वय

यहाँ “संभूति” का अर्थ है—

-कार्य-ब्रह्म, हिरण्यगर्भ, प्रकट चेतन सृष्टि

और “विनाश” का अर्थ शांकरभाष्य के अनुसार—

नश्वरता, क्षयशीलता, या वह तत्त्व जो नाशवान है (अव्याकृत/प्रकृति से सम्बन्धित दृष्टि)

अतः—

साधक को दोनों का ज्ञान होना चाहिए

सृष्टि का (संभूति)

और उसकी नश्वरता का (विनाश)

“उभयं सह” — समुच्चय का पुनः प्रतिपादन

यहाँ पुनः “सह” शब्द आता है—

दोनों को एक साथ जानना आवश्यक है

यह “ज्ञान” केवल बौद्धिक नहीं, बल्कि—

साधना में उनका समुचित स्थान समझना

और उन्हें संतुलित रूप से अपनाना

“विनाशेन मृत्युं तीर्त्वा” — नश्वरता के बोध से अतिक्रमण

यहाँ एक अत्यन्त सूक्ष्म अर्थ है

“विनाश” के द्वारा “मृत्यु” को पार करना

इसका अभिप्राय है

जब साधक नश्वरता को समझता है

तब वह आसक्ति से मुक्त होता है

अतः

नाशवान वस्तुओं का ज्ञान बन्धन को तोड़ता है

“संभूत्याऽमृतम् अश्नुते” — उपासना से उन्नति

इसके पश्चात्—

संभूति (कार्य-ब्रह्म) की उपासना द्वारा, साधक अमृतत्व को प्राप्त करता है

यहाँ अमृतत्व का अर्थ

देवतात्मभाव

उच्च लोक की प्राप्ति

क्रममुक्ति का मार्ग

जैसा कि आदि शंकराचार्य ने पूर्व में स्पष्ट किया है।

द्वन्द्व का दार्शनिक समाधान

यह मन्त्र यह सिखाता है कि

केवल नश्वरता पर ध्यान → वैराग्य तो देता है, पर पूर्णता नहीं

केवल सृष्टि (संभूति) की उपासना → उन्नति तो देती है, पर मोक्ष नहीं

अतः—

दोनों का समन्वय आवश्यक है

पूर्व मन्त्रों से सम्बन्ध

मन्त्र १२ → एकांगी उपासना की निन्दा

मन्त्र १३ → उनके फल का भेद

मन्त्र १४ → उनका समुच्चय और समाधान

यह क्रम अत्यन्त वैज्ञानिक और दार्शनिक है।

गहन संकेत

यह मन्त्र यह भी बताता है कि—

आध्यात्मिक जीवन में

वैराग्य (विनाश-बोध)

और उपासना (संभूति)

दोनों आवश्यक हैं

दृष्टांत

जैसे

कोई व्यक्ति यह समझे कि सब नश्वर है (विनाश),

और साथ ही उच्च आदर्श का अनुसरण करे (संभूति),

तभी उसका जीवन संतुलित बनता है।


ईशावास्योपनिषद् का यह चतुर्दश मन्त्र साधना के समन्वित स्वरूप का अंतिम प्रतिपादन करता है।

विनाश से वैराग्य,

संभूति से उन्नति,

और दोनों के समुच्चय से अमृतत्व।

आदि शंकराचार्य के अनुसार, यही क्रम साधक को अन्ततः आत्मज्ञान की ओर ले जाता है।

अतः—

न केवल जगत् को जानना है,

न केवल उसकी नश्वरता को,

बल्कि दोनों को समझकर उनसे ऊपर उठना ही साधना का सार है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,

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