काम-कर्मबीजस्वरूप अव्याकृत (असंभूति) की उपासना — “अन्धं तमः प्रविशन्ति…” पद पर शांकरार्थ का निबंधात्मक विवेचन
मूल पदांश (संशोधित रूप में)
अविद्यां काम-कर्म-बीजभूताम् अदर्शनात्मकां च उपासते ये,
ते तद् अनुरूपम् एव अन्धं तमः अदर्शनात्मकं प्रविशन्ति।
शावास्योपनिषद् के द्वादश मन्त्र के “अन्धं तमः प्रविशन्ति…” पद का आदि शंकराचार्य द्वारा किया गया यह भाष्य अत्यन्त सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक और दार्शनिक संकेतों से युक्त है। यहाँ “असंभूति” या “अव्याकृत प्रकृति” को केवल एक दार्शनिक तत्त्व के रूप में नहीं, बल्कि काम (इच्छा) और कर्म के बीज के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
“अविद्यां काम-कर्म-बीजभूताम्” — प्रकृति का आन्तरिक स्वरूप
शंकराचार्य “असंभूति” को केवल बाह्य प्रकृति नहीं मानते, बल्कि—
काम (इच्छा) और कर्म (क्रिया) का मूल बीज
यह वही अवस्था है
जहाँ से समस्त वासनाएँ उत्पन्न होती हैं
जहाँ से कर्मों की प्रेरणा जन्म लेती है
अतः “अविद्या” यहाँ
केवल अज्ञान नहीं,
बल्कि संसार-चक्र का कारणरूप बीज है।
“अदर्शनात्मक” — अज्ञान का मूल स्वरूप
इस पद में “अदर्शनात्मक” शब्द अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।
“दर्शन” = सत्य का प्रत्यक्ष ज्ञान
“अदर्शन” = उस सत्य का अभाव
अतः , यह अविद्या ऐसी अवस्था है जहाँ
आत्मा का साक्षात्कार नहीं होता
यही अज्ञान—
वासनाओं को जन्म देता है
कर्मों को प्रेरित करता है
और संसार के चक्र को चलाता है
“उपासते” — जड़ कारण में आसक्ति
जो साधक इस अविद्या-रूप, काम-कर्म-बीजस्वरूप प्रकृति की ही उपासना करते हैं—
वे वस्तुतः,वासनाओं के स्रोत में ही रमे रहते हैं
कारण अवस्था को ही अंतिम सत्य मान लेते हैं
यह उपासना—
चेतना को ऊर्ध्व नहीं ले जाती
बल्कि उसे उसी मूल अज्ञान में स्थिर कर देती है
“तद् अनुरूपम् एव” — फल की समानता का सिद्धान्त
यहाँ एक अत्यन्त गहरा नियम बताया गया है—
जैसा उपास्य, वैसा ही फल
यदि साधक—
जड़, अज्ञानात्मक कारण की उपासना करता है,
तो,उसका फल भी वैसा ही होगा
अर्थात्, वह उसी “अदर्शनात्मक” स्थिति को प्राप्त होगा
“अन्धं तमः” — गहन अज्ञान की अवस्था
इसका परिणाम है—
“अन्धं तमः” — पूर्ण अज्ञान
यह अन्धकार
बाह्य नहीं
बल्कि आन्तरिक चेतना का अन्धकार है
जहाँ, आत्मा का प्रकाश अनुपस्थित है
केवल वासनाओं और कर्मों का बीज शेष है
दार्शनिक गहराई
यह भाष्यांश एक अत्यन्त सूक्ष्म सत्य को उद्घाटित करता है—
संसार का मूल कारण बाह्य जगत् नहीं
बल्कि अन्तःस्थित वासनाएँ (काम) और कर्मबीज हैं
और यदि साधक, इन्हीं को साधना का विषय बना ले,
तो वह उसी चक्र में और गहराई से फँस जाता है
दृष्टांत
जैसे,कोई व्यक्ति वृक्ष के बीज को ही अंतिम सत्य मानकर उसी में रमा रहे,
और कभी वृक्ष के फल या उससे परे न जाए,
तो वह उसी बीज की सीमाओं में बँधा रहेगा।
उसी प्रकार, काम-कर्म-बीजस्वरूप अविद्या में रत साधक
उसी अज्ञान में स्थित रहता है।
इस शांकरभाष्यांश में आदि शंकराचार्य यह स्पष्ट करते हैं कि “असंभूति” या अव्याकृत प्रकृति केवल एक तत्त्व नहीं, बल्कि काम और कर्म के बीज का स्रोत है।
जो साधक उसकी ही उपासना करते हैं, वे उसी के अनुरूप—
“अदर्शनात्मक अन्धकार” को प्राप्त होते हैं।
अतः—
जड़ कारण में आसक्ति, चेतना को ऊर्ध्व नहीं ले जाती, बल्कि उसे उसी अज्ञान में स्थिर कर देती है।
यही इस पद का गूढ़ और चेतावनीपूर्ण संदेश है।
मुकेश ,,,,
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