सूक्ष्म बन्धन की पराकाष्ठा — “ततो भूय इव ते तमः…” पद पर शांकरभाष्य का निबंधात्मक विवेचन
मूल पदांश (संशोधित रूप में)
ततः — तस्मात् अपि;
भूयः इव — बहुतरम् इव, अधिकम् इव;
ते तमः प्रविशन्ति — ते गहनतरम् अज्ञानम् आप्नुवन्ति;
ये उ सम्भूत्याम् — कार्यब्रह्मणि, हिरण्यगर्भाख्ये;
रताः — आसक्ताः, अभिरताः॥१२॥
ईशावास्योपनिषद् के द्वादश मन्त्र का यह उत्तरार्ध— “ततो भूय इव ते तमो य उ सम्भूत्यां रताः”— प्रथम दृष्टि में अत्यन्त विस्मयकारी प्रतीत होता है। जहाँ पूर्व भाग में असम्भूति (अव्याकृत प्रकृति) की उपासना को अन्धकार कहा गया था, वहीं यहाँ यह कहा जा रहा है कि जो “संभूति” अर्थात् कार्यब्रह्म—हिरण्यगर्भ—में रत हैं, वे उससे भी अधिक गहन अन्धकार में प्रविष्ट होते हैं।
इस विरोधाभास के भीतर ही शास्त्र का गूढ़तम रहस्य निहित है, जिसे आदि शंकराचार्य अपने भाष्य में अत्यन्त सूक्ष्मता से उद्घाटित करते हैं।
“ततः… भूय इव” — अधिक अन्धकार का संकेत
“ततः” का अर्थ है—
उस (असंभूति-उपासना) से भी आगे
“भूय इव” —
मानो अधिक, अधिकतर, गहनतर
यहाँ “इव” (मानो) शब्द अत्यन्त सूक्ष्म है—
यह यह नहीं कहता कि वह निश्चय ही अधिक अन्धकार है,
बल्कि—
उसके समान प्रतीत होने वाला, या उससे भी अधिक सूक्ष्म बन्धन।
“संभूत्याम्” — कार्यब्रह्म, हिरण्यगर्भ
शंकराचार्य “संभूति” का अर्थ करते हैं—
कार्यब्रह्म
विशेषतः — हिरण्यगर्भ
यह—
सृष्टि का सूक्ष्म कारण
चेतन सत्ता
उपासना का उच्च विषय
अतः यह असम्भूति (जड़ प्रकृति) से उच्चतर है।
“रताः” — आसक्ति का सूक्ष्म रूप
यहाँ “रताः” शब्द अत्यन्त महत्वपूर्ण है—
केवल उपासना नहीं,
बल्कि आसक्ति, अभिमान और तल्लीनता
अर्थात्,साधक उस स्थिति में इतना रच-बस जाता है
कि उसे ही अंतिम सत्य मान लेता है
अधिक अन्धकार क्यों?
यहाँ मुख्य प्रश्न उठता है
उच्चतर उपासना होने पर भी “अधिक अन्धकार” क्यों?
इसका उत्तर अत्यन्त सूक्ष्म है
सूक्ष्म अहंकार
साधक को लगता है— “मैंने सर्वोच्च प्राप्त कर लिया”
यह ज्ञानाभिमान उसे रोक देता है
द्वैत की स्थिरता
उपासक और उपास्य का भेद बना रहता है
यह भेद ही बन्धन का कारण है
रुक जाना (stagnation)
वह आगे आत्मज्ञान की ओर नहीं बढ़ता
उसी अवस्था को अंतिम मान लेता है
अतः यह अज्ञान स्थूल नहीं, बल्कि अत्यन्त सूक्ष्म है
और इसी कारण अधिक गहन कहा गया है
असम्भूति से भी गहन बन्धन
असम्भूति (प्रकृति) → जड़ अज्ञान
संभूति (हिरण्यगर्भ) → चेतन, परन्तु द्वैतयुक्त अज्ञान
दूसरी अवस्था—
अधिक refined है
परन्तु अधिक सूक्ष्म बन्धन उत्पन्न करती है
जैसे, एक साधारण बन्धन दिखाई देता है
परन्तु स्वर्ण की जंजीर अधिक आकर्षक होकर भी बन्धन ही होती है
समुच्चय की पृष्ठभूमि
यहाँ भी वही शास्त्रीय पद्धति कार्य कर रही है—
पहले असम्भूति की निन्दा
फिर संभूति की निन्दा
उद्देश्य,
दोनों के एकांगी ग्रहण का खण्डन
और आगे
दोनों के समुच्चय की स्थापना
दार्शनिक संकेत
यह पद एक अत्यन्त गहरी चेतावनी देता है
आध्यात्मिक प्रगति के उच्च स्तर पर भी
रुक जाना सम्भव है
और वह रुकना
सबसे बड़ा बन्धन बन सकता है
इस शांकरभाष्यांश में आदि शंकराचार्य यह स्पष्ट करते हैं कि “संभूति” अर्थात् कार्यब्रह्म—हिरण्यगर्भ—की उपासना अपने आप में उच्च होते हुए भी, यदि उसे अंतिम मान लिया जाए, तो वह साधक को और भी सूक्ष्म अज्ञान में बाँध देती है।
अतः—
उच्चतर साधना भी बन्धन बन सकती है, यदि वह अंतिम सत्य तक न ले जाए।
यही इस पद का गूढ़ संदेश है—
न जड़ में रुकना है,
न सृष्टि में,
बल्कि दोनों के पार जाकर उस परम अद्वैत सत्य को जानना है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,
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