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Sunday, 19 April 2026

ईशावास्योपनिषद् — त्रयोदश मन्त्र का निबंधात्मक विवेचन (संभव–असंभव के भेद का श्रुति-प्रमाण

 ईशावास्योपनिषद् — त्रयोदश मन्त्र का निबंधात्मक विवेचन (संभव–असंभव के भेद का श्रुति-प्रमाण)

अन्यदेवाहुः सम्भवादन्यदाहुरसंभवात् ।

इति शुश्रुम धीराणां ये नस्तद्विचचक्षिरे ॥१३॥

धीराः (विद्वांसः) आहुः— सम्भवात् अन्यत् एव (फलम्), असम्भवात् अन्यत् आहुः।

इति (एवं) वयम् शुश्रुम— ये नः तत् विचचक्षिरे (तेभ्यः)।

धीर पुरुष कहते हैं कि “संभव” (कार्य-ब्रह्म, हिरण्यगर्भ आदि) से प्राप्त फल कुछ और है, और “असंभव” (अव्याकृत, प्रकृति आदि) से प्राप्त फल उससे भिन्न है। ऐसा हमने उन धीर पुरुषों से सुना है जिन्होंने हमें इसका यथार्थ उपदेश दिया है।

ईशावास्योपनिषद् का यह त्रयोदश मन्त्र, द्वादश मन्त्र में उठे हुए गूढ़ प्रश्न का समाधान प्रस्तुत करता है। द्वादश मन्त्र में यह कहा गया कि असम्भूति (अव्याकृत कारण) की उपासना अन्धकार की ओर ले जाती है और सम्भूति (कार्य-ब्रह्म) में रत रहने वाले उससे भी अधिक गहन अन्धकार में प्रविष्ट होते हैं। यह कथन प्रथम दृष्टि में विरोधाभासी प्रतीत होता है और साधक के मन में यह संशय उत्पन्न करता है कि इन दोनों उपासनाओं का यथार्थ स्वरूप और फल क्या है।

इसी संशय के निवारणार्थ यह मन्त्र उद्घोष करता है—

“अन्यदेव आहुः सम्भवात्, अन्यदाहुः असम्भवात्”।

अर्थात्—

- सम्भूति और असम्भूति— दोनों के फल परस्पर भिन्न हैं।

यहाँ “अन्यत्” शब्द अत्यन्त महत्वपूर्ण है। यह केवल भिन्नता नहीं, बल्कि—

स्वरूपतः और फलतः पूर्ण भेद का द्योतक है।

“सम्भव” और “असम्भव” का दार्शनिक अर्थ

शांकरभाष्य के अनुसार—

सम्भव = कार्य-ब्रह्म, विशेषतः हिरण्यगर्भ (व्यक्त, चेतन सृष्टि का कारण)

असम्भव = अव्याकृत प्रकृति, मूल कारण (अव्यक्त, जड़ अवस्था)

अतः—

एक चेतन, प्रकट सत्ता है

- दूसरा जड़, अप्रकट कारण

इन दोनों के साधन और फल भी स्वाभाविक रूप से भिन्न होंगे।

भिन्न फल का सिद्धान्त

यह मन्त्र यह स्थापित करता है कि—

असम्भव (प्रकृति) की उपासना → जड़ता, कारण-अवस्था में लय

सम्भव (हिरण्यगर्भ) की उपासना → उच्चतर लोक, सूक्ष्म चेतन अवस्था

किन्तु—

दोनों ही परम ब्रह्म नहीं हैं

दोनों ही साधन के स्तर पर सीमित हैं

इस प्रकार—

यह भेद साधक को यह समझाने के लिए है कि

किसी एक को अंतिम सत्य न माने।

“इति शुश्रुम धीराणाम्” — प्रमाण का पुनःस्थापन

इस मन्त्र में पुनः वही पद आता है—

“इति शुश्रुम धीराणाम्”

यह अत्यन्त महत्वपूर्ण है, क्योंकि—

यह उपदेश किसी व्यक्तिगत मत पर आधारित नहीं है

यह श्रुति-परंपरा से प्राप्त है

“धीर” वे हैं—

जिन्होंने सत्य का साक्षात्कार किया है

जिनका ज्ञान अनुभव से पुष्ट है

आदि शंकराचार्य के अनुसार, ऐसे तत्त्वदर्शी पुरुषों का वचन ही वास्तविक प्रमाण है।

“ये नः तद्विचचक्षिरे” — परंपरा का प्रवाह

यहाँ यह भी स्पष्ट किया गया है कि—

यह ज्ञान हमें उन आचार्यों से प्राप्त हुआ है

जिन्होंने इसे विस्तारपूर्वक समझाया है

अर्थात्—

यह ज्ञान परंपरागत है

गुरु-शिष्य श्रृंखला के माध्यम से प्रवाहित हुआ है

पूर्व मन्त्रों से सम्बन्ध

द्वादश मन्त्र → एकांगी उपासना की निन्दा

त्रयोदश मन्त्र → उनके फल का भेद स्पष्ट करना

अतः—

यह मन्त्र निन्दा का कारण बताता है

और साधक के संशय को दूर करता है

दार्शनिक निष्कर्ष

इस मन्त्र का मुख्य संदेश है—

संभव और असंभव— दोनों के फल भिन्न हैं, परन्तु दोनों ही सीमित हैं।

अतः—

इनमें से किसी एक को अंतिम न मानें

दोनों को साधन के रूप में समझें

उपसंहार

ईशावास्योपनिषद् का यह त्रयोदश मन्त्र साधक को स्पष्ट दिशा देता है कि साधना के विभिन्न स्तरों में भेद करना आवश्यक है।

न तो प्रकृति ही अंतिम है,

न ही सृष्टि का सूक्ष्म कारण;

बल्कि दोनों के पार जो परम सत्य है— वही साध्य है।

और उस सत्य तक पहुँचने का मार्ग—

श्रुति-परंपरा और धीर आचार्यों के उपदेश से ही स्पष्ट होता है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,

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