“विद्या-शब्द का तात्पर्य और संशय-निरास: परमात्मविद्या की शांकर-मीमांसा”
शुद्ध पदांश (संभावित पुनर्निर्माण)
“अतः तन्निराकरणार्थं संक्षेपतः विचारणां करिष्यामः।
तत्र तावत् किंनिमित्तः संशय इति उच्यते—
विद्याशब्देन मुख्यया परमात्मविद्या किमर्थं न गृह्यते? अमृतत्वं च।
ननु उक्तायाः परमात्मविद्यायाः … (प्राप्तत्वात् इति)।”
अन्वय
अतः तस्य (संशयस्य) निराकरणार्थं संक्षेपतः विचारणां करिष्यामः।
तत्र तावत् किं निमित्तः संशयः इति उच्यते—
विद्याशब्देन मुख्यया परमात्मविद्या किमर्थं न गृह्यते, अमृतत्वं च?
ननु उक्तायाः परमात्मविद्यायाः (ग्रहणं स्यात्) इति।
इस संशय को दूर करने के लिए अब संक्षेप में विचार करेंगे।
पहले यह पूछा जाता है कि यह संशय क्यों उत्पन्न हुआ?
क्या “विद्या” शब्द से मुख्य रूप से परमात्मा का ज्ञान (ब्रह्मविद्या) ही नहीं लिया जाना चाहिए? और “अमृतत्व” भी उसी का फल है।
तो फिर यहाँ परमात्मविद्या ही क्यों नहीं मानी जाए?
यहाँ शास्त्रकार उस संशय का विधिवत् निरूपण करता है, जो पूर्वोक्त “अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययाऽमृतमश्नुते” इति वाक्य के अर्थग्रहण में उत्पन्न होता है।
“अतः तन्निराकरणार्थं”—
अर्थात् उस संशय के समाधान के लिए, जो विद्या–अविद्या-वाक्य से उत्पन्न हुआ है।
यह शास्त्रीय पद्धति है—पूर्वपक्ष–सिद्धान्त के द्वारा तत्त्वनिर्णय।
“संक्षेपतः विचारणां करिष्यामः”—
यहाँ “संक्षेपतः” शब्द सूचित करता है कि यद्यपि विषय अत्यन्त गूढ़ है, तथापि संक्षिप्त रूप में उसका तत्त्व प्रस्तुत किया जाएगा।
शंकराचार्य की शैली में यह युक्ति-प्रधान, तर्कसंगत विवेचन का आरम्भ है।
“तत्र तावत् किंनिमित्तः संशयः”—
किस कारण से यह संशय उत्पन्न हुआ?
यह प्रश्न अत्यन्त आवश्यक है, क्योंकि—
संशय का कारण जाने बिना उसका समाधान सम्भव नहीं।
संशय का मूल
“विद्याशब्देन मुख्यया परमात्मविद्या किमर्थं न गृह्यते?”
यहाँ पूर्वपक्षी कहता है—
“विद्या” शब्द का मुख्य अर्थ है—ब्रह्मज्ञान
श्रुति में “विद्या” प्रायः परमात्मविद्या के लिए ही प्रयुक्त होती है
अतः—
यहाँ भी “विद्या” = ब्रह्मविद्या ही क्यों न मानी जाए?
“अमृतत्वं च”—
“अमृतत्व” शब्द का भी मुख्य अर्थ है—मोक्ष, जो केवल आत्मज्ञान से ही सम्भव है।
अतः—
यदि “अमृतत्व” = मोक्ष है,
तो उसका कारण भी “ब्रह्मविद्या” ही होना चाहिए।
पूर्वपक्ष की स्थापना
“ननु उक्तायाः परमात्मविद्यायाः …”
पूर्वपक्षी आगे तर्क करता है—
“श्रुति में जहाँ-जहाँ ‘विद्या’ कहा गया है, वहाँ परमात्मविद्या ही ग्रहण की जाती है।”
अतः—
यहाँ भी वही ग्रहण होना चाहिए
और इस प्रकार “अविद्या + विद्या” का समुच्चय मोक्ष का साधन बन सकता है
शांकर-समाधान की दिशा (संकेत)
यहाँ से शंकराचार्य यह सिद्ध करेंगे कि—
❌ “विद्या” यहाँ परमात्मविद्या नहीं है
✔ बल्कि देवता-उपासना (अपर विद्या) है
क्यों?
प्रकरण-संगति (Context)
पूर्व और उत्तर मन्त्रों में उपासना का ही वर्णन है
अतः “विद्या” भी उसी सन्दर्भ में ग्रहण करनी होगी
समुच्चय की असम्भवता
यदि “विद्या” = ब्रह्मज्ञान हो,
तो “अविद्या” (कर्म) के साथ उसका समुच्चय असंगत होगा
क्योंकि ज्ञान और कर्म परस्पर विरोधी हैं—
“ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात् करोति”।
तात्त्विक विवेचन
यह पदांश हमें यह सिखाता है कि—
शब्द का अर्थ केवल शब्दकोश से नहीं,
बल्कि प्रकरण, सन्दर्भ और तात्पर्य से निर्धारित होता है।
अतः—
“विद्या” का अर्थ हर स्थान पर समान नहीं होता।
अद्वैत सिद्धान्त की प्रतिष्ठा
इस सम्पूर्ण विचार का उद्देश्य यह है कि—
ब्रह्मज्ञान (परमात्मविद्या) ही मोक्ष का एकमात्र साधन है
उसे कर्म या उपासना के साथ नहीं जोड़ा जा सकता
अतः—
“विद्या” (यहाँ) = उपासना
“ज्ञान” = उससे भिन्न, और उच्चतर
और अन्ततः—
ज्ञान ही अद्वैत का साक्षात्कार कराता है।
उपसंहार (दार्शनिक निष्कर्ष)
यह पदांश शास्त्रीय विवेचन की उस प्रक्रिया को दर्शाता है जहाँ—
संशय उठाया जाता है
उसका कारण खोजा जाता है
और फिर तात्त्विक समाधान प्रस्तुत किया जाता है
अतः—
“विद्या” शब्द का अर्थ सन्दर्भानुसार ग्रहण करना आवश्यक है,
और यहाँ वह परमात्मविद्या न होकर उपासना है।
इस प्रकार—
कर्म, उपासना और ज्ञान—इनके स्थानों का यथार्थ विवेक ही
अद्वैत वेदान्त का मर्म है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,,
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