“विद्या–अविद्या-वाक्य के आलोक में मृत्यु-अतिक्रमण का संशय और उसका शांकर-समाधान”
शुद्ध पदांश (संभावित पुनर्निर्माण)
“अत्र ‘अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययाऽमृतमश्नुते’ इति श्रुत्वा केचित् संशयं इव (प्राप्नुवन्ति)।”
अन्वय
अत्र ‘अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा, विद्यया अमृतम् अश्नुते’ इति श्रुत्वा, केचित् संशयं इव (कुर्वन्ति)।
यहाँ “अविद्या से मृत्यु को पार करके और विद्या से अमृतत्व को प्राप्त होता है”—इस वाक्य को सुनकर कुछ लोग एक प्रकार का संशय करते हैं।
यह पदांश उपनिषद् के अत्यन्त गूढ़ सिद्धान्त—विद्या और अविद्या के सम्बन्ध—पर उत्पन्न होने वाले संशय का संकेत करता है।
“अत्र”—यहाँ, अर्थात् ईशावास्योपनिषद् के पूर्वोक्त मन्त्र (११) के सन्दर्भ में।
“अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा”—
यहाँ “अविद्या” शब्द का सामान्य अर्थ अज्ञान नहीं, बल्कि कर्म है—
अविद्या = वेदविहित कर्म
“मृत्युं तीर्त्वा”—मृत्यु को पार करना—
अर्थात्—
अधर्मजन्य पतन से बचना
निम्न योनियों में पतन से रक्षा
अतः कर्म (अविद्या) का प्रयोजन—
संसार में स्थैर्य और शुद्धि।
“विद्यया अमृतम् अश्नुते”—
यहाँ “विद्या” का अर्थ है—उपासना, देवता-ज्ञान, हिरण्यगर्भ-ध्यान।
“अमृतम् अश्नुते”—अमृतत्व को प्राप्त होता है—
यहाँ अमृतत्व का अर्थ—
तत्काल मोक्ष नहीं
अपितु देवयान मार्ग से ब्रह्मलोक-प्राप्ति (क्रममुक्ति)
संशय का उदय
“केचित् संशयं इव”—
कुछ लोग इस प्रकार का संशय करते हैं—
यदि अविद्या (कर्म) से मृत्यु का अतिक्रमण होता है,
और विद्या (उपासना) से अमृतत्व प्राप्त होता है,
तो क्या—
दोनों का समुच्चय ही मोक्ष का साधन है?
क्या ज्ञान (ब्रह्मविद्या) की आवश्यकता नहीं?
शांकर-समाधान (तत्त्वनिर्णय)
शंकराचार्य इस संशय का सूक्ष्म निराकरण करते हैं—
1. अविद्या (कर्म) का स्थान
कर्म चित्तशुद्धि का साधन है
यह केवल अधर्म का निवारण करता है
परन्तु मोक्ष का कारण नहीं
“न कर्मणा मोक्षः”
2. विद्या (उपासना) का स्थान
उपासना चित्त को एकाग्र करती है
इससे उच्च लोक (ब्रह्मलोक) की प्राप्ति होती है
किन्तु यह भी प्रत्यक्ष मोक्ष का साधन नहीं
यह क्रममुक्ति का साधन है, न कि सद्यःमुक्ति।
3. ज्ञान (ब्रह्मविद्या) की अनिवार्यता
शंकरमत का स्पष्ट निष्कर्ष—
केवल आत्मज्ञान ही मोक्ष का कारण है।
न कर्म
न उपासना
केवल अविद्यानिवृत्ति (ज्ञान)
“तमेव विदित्वाऽतिमृत्युमेति”—इति श्रुतेः।
समुच्चय का खण्डन
यद्यपि श्रुति में “अविद्या + विद्या” का संयुक्त उल्लेख है, तथापि—
यह मोक्ष के लिए समुच्चय नहीं,
बल्कि क्रमिक साधना का निर्देश है—
कर्म → चित्तशुद्धि
उपासना → चित्तएकाग्रता
ज्ञान → मोक्ष
अतः—
समुच्चय केवल साधन-क्रम में है,
न कि फल (मोक्ष) के साधन में।
अद्वैत सिद्धान्त की प्रतिष्ठा
यह संशय और उसका समाधान अन्ततः अद्वैत की ओर ले जाता है—
जब तक कर्म है → द्वैत है
जब तक उपासना है → साधक–साध्य भेद है
किन्तु—
ज्ञान में—
न कर्ता
न कर्म
न उपास्य
केवल—
एकमेव अद्वितीय ब्रह्म
उपसंहार (दार्शनिक निष्कर्ष)
यह पदांश यह स्पष्ट करता है कि—
श्रुति के वाक्यों को सतही रूप में ग्रहण करने से संशय उत्पन्न होता है
उनका तात्त्विक विवेचन आवश्यक है
अतः—
“अविद्या और विद्या का समुच्चय मोक्ष का साधन नहीं,
बल्कि ज्ञान की प्राप्ति के लिए क्रमिक साधना है।”
और अन्ततः—
आत्मज्ञान ही वह साधन है जिससे मृत्यु का पूर्ण अतिक्रमण होता है और अमृतत्व की वास्तविक प्राप्ति होती है।
यही शांकर-वेदान्त का अटल निष्कर्ष है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
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