होम | रोज़नामचा | कविताएँ | कहानियाँ | विचार | ज्योतिष | लेखक

Tuesday, 21 April 2026

पाप-वियोजन और नमस्कार-समर्पण: अग्नि-प्रार्थना का अन्तिम शांकर-विवेचन”

 पाप-वियोजन और नमस्कार-समर्पण: अग्नि-प्रार्थना का अन्तिम शांकर-विवेचन”

शुद्ध पदांश (संभावित पुनर्निर्माण)

“अस्मत्तः जुहुराणम्—दुष्टतरं, वक्रभावात्मकम् एनः—पापम्।

ततः वयं विशुद्धाः सन्तः इष्टं प्राप्स्याम इत्यभिप्रायः।

किन्तु वयम् इदानीं ते न शक्नुमः परिचर्यां कर्तुम्।

भूयिष्ठां—बहुविधां ते—तुभ्यं नम-उक्तिं विधेम; नमस्कारेण परिचरेम इत्यर्थः॥१८॥”

अन्वय

अस्मत्तः जुहुराणम् (दुष्टतरं, वक्रभावात्मकम्) एनः (पापम्) युयोधि।

ततः वयं विशुद्धाः सन्तः इष्टं प्राप्स्याम इति अभिप्रायः।

किन्तु वयम् इदानीं ते परिचर्यां कर्तुं न शक्नुमः।

अतः तुभ्यं भूयिष्ठां नम-उक्तिं विधेम; नमस्कारेण परिचरेम इत्यर्थः।


हमारे भीतर स्थित कुटिल और दुष्ट पापों को हमसे दूर कर दीजिए।

तब हम शुद्ध होकर इच्छित फल को प्राप्त करेंगे—यह हमारा अभिप्राय है।

किन्तु अभी हम आपकी विधिवत सेवा करने में समर्थ नहीं हैं।

इसलिए हम आपको बार-बार नमस्कार करते हैं—यही हमारी सेवा है।


यह पदांश उपनिषद् के अन्तिम मन्त्र का अत्यन्त मार्मिक और गूढ़ अंश है, जहाँ साधक की पूर्ण विनय, असमर्थता की स्वीकृति और समर्पणभाव एक साथ प्रकट होते हैं।


“अस्मत्तः जुहुराणम् एनः”—

“जुहुराण” शब्द का अर्थ है—त्याज्य, कुटिल, वक्रस्वभावयुक्त।

“एनः” = पाप, दोष, अविद्या-जन्य मल।


अतः यहाँ साधक अपने भीतर स्थित उस पाप-तत्त्व की ओर संकेत करता है जो—

चित्त को विकृत करता है

सत्य के बोध में बाधक है


यह शंकरमत में मल (अशुद्धि) के रूप में प्रसिद्ध है।

“वक्रभावात्मकम्”—

यह विशेषण अत्यन्त सूक्ष्म है। पाप केवल बाह्य कर्म नहीं, बल्कि—


अन्तःकरण की कुटिलता, विकृति, स्वार्थ, राग-द्वेष—ये सब “वक्रभाव” हैं।

यही वास्तविक बन्धन है।

“ततः वयं विशुद्धाः सन्तः इष्टं प्राप्स्याम”—

यहाँ साधक का विश्वास प्रकट होता है कि—


पाप-क्षय होने पर

चित्तशुद्धि प्राप्त होगी

और तब “इष्ट” की प्राप्ति होगी

यह “इष्ट”—

उपासक के लिए = ब्रह्मलोक या श्रेष्ठ फल

ज्ञानी के लिए = आत्मज्ञान (मोक्ष)


शंकराचार्य के अनुसार—

चित्तशुद्धि ज्ञान का कारण नहीं, परन्तु ज्ञान की योग्यता का कारण है।

“किन्तु वयम् इदानीं ते न शक्नुमः परिचर्यां कर्तुम्”—

यहाँ साधक अपनी असमर्थता स्वीकार करता है।


मरणासन्न अवस्था

इन्द्रियों की क्षीणता

कर्म करने की असमर्थता


अतः वह यज्ञ, पूजा, विधि—इन सबका पालन नहीं कर सकता।

यहाँ एक गम्भीर तत्त्व है—

कर्म की सीमा का बोध।


“भूयिष्ठां ते नम-उक्तिं विधेम”—

“भूयिष्ठाम्” = अत्यधिक, बार-बार

“नम-उक्ति” = नमस्कार के वचन


यहाँ साधक कहता है—

“अब हम केवल नमस्कार ही कर सकते हैं।”


यह भक्ति और समर्पण का चरम रूप है।

“नमस्कारेण परिचरेम इत्यर्थः”—

यहाँ नमस्कार को ही “परिचर्या” (सेवा) के रूप में स्वीकार किया गया है।


अर्थात्—

 जब कर्म सम्भव न हो, तब भी भाव सम्भव है।

और वही भाव अन्ततः साधना का सार है।


तात्त्विक विवेचन

यह पदांश तीन प्रमुख सत्यों को उद्घाटित करता है—

1. पाप का स्वरूप

बाह्य कर्म से अधिक अन्तःकरण की विकृति

“वक्रभाव” ही वास्तविक बन्धन

2. चित्तशुद्धि का महत्व

पाप-क्षय → शुद्धि

शुद्धि → ज्ञान की योग्यता

3. समर्पण की पराकाष्ठा

कर्म-असमर्थता के बावजूद

नमस्कार-रूप भक्ति

विद्या–अविद्या एवं संक्रमण

“एनः” → अविद्या (मल, पाप)

“विशुद्धाः सन्तः” → विद्या की पूर्वावस्था


यहाँ साधक अविद्या से विद्या की ओर बढ़ रहा है।

प्रवृत्ति–निवृत्ति

कर्म-असमर्थता → प्रवृत्ति का अन्त

नमस्कार-समर्पण → निवृत्ति की पूर्णता


यहाँ साधना का अन्तिम चरण है।

अद्वैत की अन्तिम परिणति


जब—

पाप का क्षय होता है

चित्त शुद्ध होता है

और अहंकार नम्र हो जाता है


तब—

आत्मज्ञान स्वतः उदित होता है


और उस ज्ञान में—

न पाप रहता है

न पुण्य

न साधक, न साध्य


केवल—

अद्वैत ब्रह्म


यह पदांश उपनिषद् का अत्यन्त भावपूर्ण समापन है—

पाप-स्वीकार

शुद्धि की आकांक्षा

असमर्थता की विनम्र स्वीकृति

और अन्ततः पूर्ण समर्पण


अतः—

“जब सब साधन छूट जाएँ, तब भी नमस्कार शेष रहता है।”

और वही नमस्कार—

अहंकार का विसर्जन है

और आत्मज्ञान का द्वार


यही इस मन्त्र का, और समस्त उपनिषद् का अन्तिम रहस्य है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

No comments:

Post a Comment