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Monday, 27 April 2026

चाय बनाना

 चाय बनाना


पानी चढ़ाया

बस इतना-सा काम था…


रसोई वैसी ही थी,

बर्तन वही,

चूल्हे की हल्की-सी आवाज़ भी वही…


कुछ बदला नहीं था—

फिर भी

सब कुछ वैसा नहीं था…


पहले

चाय बनाना

एक काम था


जल्दी-जल्दी,

किसी और सोच में डूबे हुए…


हाथ कुछ और कर रहे होते,

मन कहीं और भटक रहा होता…


आज

पानी उबल रहा था,

और मैं

उसी के साथ था…


कोई जल्दी नहीं,

कोई खयाल नहीं

जो बीच में आकर

इस पल को खा जाए…


चम्मच घुमाई

चीनी घुलती गई…


एक पल को लगा

जैसे घुलना ही

इसका स्वभाव है…


और शायद

मेरा भी…


दूध डाला

रंग बदल गया…


इतनी-सी बात

मगर पहले कभी

ध्यान नहीं गया था…


चाय

बस बनती नहीं

बदलती है…


और उस बदलने में

कोई शोर नहीं होता…


मैंने कप उठाया


हाथ में

हल्की-सी गर्माहट थी…


पहले

मैं इस गर्माहट को

महसूस नहीं करता था…


क्योंकि

मैं हमेशा

किसी अगले पल में होता था…


आज

कोई अगला पल नहीं था…


बस

यही था…


मैंने एक घूंट लिया


कोई बड़ी बात नहीं हुई…


न कोई ज्ञान,

न कोई रहस्य…


बस

एक साधारण-सा स्वाद…


मगर

पहली बार

वो पूरा था…


बिना तुलना,

बिना जल्दी,

बिना किसी कहानी के…


खिड़की के बाहर

लोग जा रहे थे


किसी को जल्दी थी,

किसी को नहीं…


मैंने देखा

और बस देखा…


न कोई विचार,

न कोई निर्णय…


चाय

धीरे-धीरे खत्म हो गई…


और अजीब बात


कुछ भी “खत्म” नहीं हुआ…


कप खाली था

पर

अंदर कुछ भी कम नहीं था…


मैंने कप रखा


और उसी सहजता से

अगले काम की तरफ़ बढ़ गया…


जैसे

कुछ खास हुआ ही नहीं…


और शायद

यही खास था…


एक कप चाय में ही सारा जहाँ उतर आया,

कुछ भी नहीं बदला—मगर सब नज़र आया।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,

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