वापसी — जहाँ सब कुछ वैसा ही है, पर कुछ भी पहले जैसा नहीं
मैं लौट आया
उसी शहर में,
उसी रास्तों पर,
उन्हीं चेहरों के बीच…
कुछ भी बदला नहीं था
दुकानें वैसे ही खुलती थीं,
लोग वैसे ही बातें करते थे,
हँसी भी वही थी,
और शिकायतें भी…
मगर
एक बहुत महीन-सी चीज़
अब नहीं थी
वो
जो हर चीज़ से चिपकी रहती थी…
पहले
मैं हर बात में
खुद को ढूँढता था
किसी की बात में
अपनी तस्दीक,
किसी की नज़र में
अपनी पहचान…
अब
बातें बस बातें थीं…
वे आती थीं,
ठहरती थीं,
और चली जाती थीं…
मैंने एक दोस्त से बात की
वो अपनी परेशानी बता रहा था,
अपने डर,
अपने उलझे हुए सवाल…
पहले
मैं या तो उसे समझाने लगता,
या उसके दर्द में
खुद को जोड़ लेता…
आज
मैं बस सुन रहा था…
सुनना भी
एक अजीब चीज़ है
अगर उसमें “मैं” न हो,
तो
वो किसी इलाज जैसा हो जाता है…
वो बोलता गया
और धीरे-धीरे
उसकी आवाज़ हल्की पड़ती गई…
शायद
उसे जवाब नहीं चाहिए था…
बस
कोई चाहिए था
जो बीच में न आए…
मैं उठा,
बाज़ार की तरफ़ चला गया…
भीड़ थी
धक्का-मुक्की,
आवाज़ें,
तेज़ रफ़्तार…
पहले
ये सब मुझे खींच लेते थे
कभी बेचैनी में,
कभी उत्साह में…
अब
ये सब
जैसे मेरे बाहर घट रहा था…
और मैं
उसमें शामिल भी था,
और उससे अलग भी…
एक आदमी
ज़ोर से बहस कर रहा था
उसकी आवाज़ में
एक डर छुपा था…
मैंने उसे देखा
और बस देखा…
उसे गलत ठहराया,
न सही…
क्योंकि
अब हर कोई
अपनी-अपनी कहानी में
सही ही लगता है…
मैं आगे बढ़ गया
अब
किसी को बदलने की
जल्दी नहीं थी…
न खुद को,
न किसी और को…
शाम को
घर लौटा
थकान थी,
मगर बोझ नहीं…
पहले
दिन अपने साथ
कई चीज़ें लाता था
अधूरी बातें,
अनकहे जवाब,
छोटी-छोटी खलिशें…
आज
दिन आया था,
और चला गया…
जैसे
लहर आती है
और बिना निशान छोड़े
लौट जाती है…
मैंने लेटकर
आँखें बंद कीं
कोई विचार नहीं आया…
और अगर आया भी
तो
रुका नहीं…
नींद
धीरे-धीरे उतर आई…
बिना कोशिश,
बिना किसी कहानी के…
और उस सन्नाटे में
अब कोई डर नहीं था…
क्योंकि
अब खोने के लिए
कुछ बचा ही नहीं था…
और अजीब बात
इसी में
सब कुछ सुरक्षित था…
लौटकर आया तो दुनिया वही पाई मैंने,
मैं बदल गया था—तो हर चीज़ नई पाई मैंने।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,
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