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Monday, 27 April 2026

साधारण का भार

 साधारण का भार


सुबह

वैसी ही आई


अलार्म नहीं बजा,

फिर भी आँख खुल गई…

कमरे में

हल्की-सी रोशनी थी,

और हवा में

रात का बचा हुआ सन्नाटा…


कुछ भी असाधारण नहीं था


फिर भी

एक अजीब-सा “भार” था…


जैसे

हर चीज़

अपने होने का वज़न लिए हुए हो…


मैं उठा

ज़मीन पर पैर रखा,

तो लगा

जैसे ज़मीन

सिर्फ़ सहारा नहीं,

एक गवाही है…


कि मैं यहाँ हूँ…


पहले

मैं इन बातों को

सोचता नहीं था


अब

सोच भी नहीं रहा था,

बस

महसूस हो रहा था…


मैंने दरवाज़ा खोला


बाहर

एक बूढ़ा आदमी

धीरे-धीरे चल रहा था…


उसके कदम

थोड़े डगमगाते थे,

मगर

हर कदम में

एक पूरी उम्र थी…


मैंने उसे देखा


पहले

मैं उसे

बस “एक बूढ़ा” कहकर

आगे बढ़ जाता…


आज

उसकी चाल में

एक कहानी थी…


कोई शब्द नहीं,

कोई बयान नहीं…


फिर भी

सब कुछ साफ़…


मैं सड़क पर आया


लोग

अपने-अपने काम में लगे थे…


कोई जल्दी में,

कोई थका हुआ,

कोई खोया हुआ…


और अजीब बात


अब

हर चेहरा

मुझे अलग नहीं लगता था…


जैसे

सब एक ही चीज़ के

अलग-अलग रंग हों…


कोई हँस रहा था

तो उसमें भी

एक हल्की-सी थकान थी…


कोई चुप था

तो उसमें भी

एक अनकही पुकार…


पहले

मैं इन सबको

समझने की कोशिश करता था…


अब

समझने की ज़रूरत नहीं थी…


क्योंकि

कुछ भी अलग नहीं था…


मैं एक दुकान पर रुका


पानी लिया,

पैसे दिए…


दुकानदार ने

मेरी तरफ़ देखा


एक पल को

हमारी नज़र मिली…


कुछ भी खास नहीं हुआ


मगर

वो पल

खाली नहीं था…


जैसे

दो ज़िंदगियाँ

एक-दूसरे को छूकर

बिना शोर

आगे बढ़ गईं…


मैंने महसूस किया


अब

हर छोटा काम

अपना पूरा वजन रखता है…


कोई चीज़

हल्की नहीं रही…


और फिर भी

कुछ भी

बोझ नहीं है…


ये कैसा संतुलन है…?


जहाँ

सब कुछ

गहरा है

मगर

कुछ भी भारी नहीं…


शायद

यही जीना है


बिना भागे,

बिना पकड़ें…


बस

हर पल को

उसके पूरे वजूद के साथ

होने देना…


मैं चलते-चलते

रुक गया


कोई वजह नहीं थी…


बस

रुकना हुआ…


और उसी ठहराव में

कुछ भी अधूरा नहीं था…


हर लम्हा अपने वजूद का वजन लेकर आया,

कुछ भी नहीं था बोझ—फिर भी सब कुछ समाया।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,

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