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Wednesday, 22 April 2026

नटखट बच्चे को नहलाती माँ — एक शब्द-चित्र

 नटखट बच्चे को नहलाती माँ — एक शब्द-चित्र 

बाल्टी में गुनगुना पानी है,

धूप खिड़की से आकर

फर्श पर छोटी-सी नदी बना रही है।

माँ के हाथों में साबुन की झाग,

और सामने

पानी से खेलता एक छोटा-सा तूफ़ान।

वो बार-बार फिसलता है,

हँसता है,

छप-छप करके दुनिया को भिगो देना चाहता है।

माँ की डाँट भी

मुस्कान में घुली है—

“चुप बैठो…”

और उँगलियाँ फिर से उसे थाम लेती हैं।

झाग उसके बालों में

बादल बन जाते हैं,

और आँखों में

सिर्फ़ खेल की चमक है।

अचानक

मुँह में साबुन चला जाता है—

वो रो पड़ता है,

आँखें सिकुड़ जाती हैं,

छोटी-सी दुनिया

नमक-सी लगने लगती है।

माँ जल्दी से

पानी के छींटे देती है,

“बस-बस…” कहती हुई

रोने को

अपने हाथों में समेट लेती है।

नहला कर

मुलायम तौलिये में लपेटती है,

फिर अपने आँचल से

उसके गाल, माथा, बाल

धीरे-धीरे पोंछती है।

उसके रोने की जगह

अब सिसकियाँ हैं,

और माँ की हथेलियों में

सारा सुकून।

आँखों में काजल लगाती है,

एक छोटा-सा टीका—

नज़र से बचाने को

ममता का पहरा।

गोद में लेकर

आँचल के भीतर

दूध पिलाती है—

जैसे दुनिया को

फिर से भर रही हो।

बच्चा

धीरे-धीरे शांत होता है,

साँसें लय में आती हैं,

और नींद

उसकी पलकों पर उतर जाती है।

माँ उसे सुलाती है,

हल्का-सा धिठौना लगाकर,

एक बार

तृप्त नज़र से देखती है—

जैसे कोई पूजा

पूरी हो गई हो।

फिर चुपचाप उठकर

घर के काम में लग जाती है,

पर उसके भीतर

वो पल

अब भी गुनगुना रहा होता है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,

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