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Wednesday, 22 April 2026

रोटी बेलती औरत

 रोटी बेलती औरत

1

रोटी बेलती औरत

आटे में

दिन भर की थकान गूँथती है।

2

उसकी हथेलियों में

एक लय है,

जैसे कोई पुराना गीत

धीरे-धीरे बज रहा हो।

3

बेलन चलता है,

गोलाई बनती है—

जैसे जीवन को

फिर से समेट रही हो।

4

आँच पर रखी तवा,

और उसके सामने

उसकी चुप मेहनत।

5

रोटी फूलती है,

वो हल्का-सा मुस्कुराती है

जैसे छोटी-सी जीत

मिल गई हो।

6

आटे की खुशबू में

घर बसता है,

और उसके हाथों में

सबका पेट।

7

वो बोलती कम है,

पर हर रोटी में

कुछ कह जाती है।

8

हाथ रुकते नहीं,

भले मन

कहीं और चला जाए।

9

रात के खाने में

सबका हिस्सा है,

पर उसकी थकान

किसी थाली में नहीं आती।

10

रोटी बेलती औरत

घर की सबसे साधारण,

और सबसे ज़रूरी

कविता होती है।


मुकेश ,,,,,,,,,

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