कोशिकाओं का एकांत
शरीर के विराट नगर में
जहाँ अरबों निवासी बसते हैं,
वहीं हर एक कोशिका
अपने भीतर एकांत का घर बनाए बैठी है।
सूक्ष्मदर्शी की ठंडी आँख से देखो तो
वह कोई भीड़ नहीं,
बल्कि अलग-अलग दुनियाओं का समूह है,
हर कोशिका एक स्वतंत्र ब्रह्मांड,
जिसकी अपनी सीमाएँ हैं
cell membrane,
एक अदृश्य दीवार,
जो बाहर और भीतर के बीच
सतर्क प्रहरी बनी खड़ी है।
विज्ञान कहता है
यह झिल्ली केवल आवरण नहीं,
यह चयन करती है
क्या भीतर आएगा,
क्या बाहर जाएगा।
पर इस चयन में ही
छिपा है उसका एकांत
हर संवाद सीमित,
हर संपर्क नियंत्रित।
नाभिक के भीतर
डीएनए की कुंडलित सीढ़ियाँ
जैसे समय ने खुद को
लिपिबद्ध कर दिया हो,
हर कोशिका के पास
एक ही पुस्तक है,
पर हर कोई उसे
अपने-अपने तरीके से पढ़ता है।
किसी में वह त्वचा बन जाती है,
किसी में विचार,
किसी में धड़कन,
और किसी में केवल
मौन।
कोशिकाएँ जुड़ी हैं
gap junctions के पुलों से,
रासायनिक संकेतों की भाषा से,
पर फिर भी
कोई भी पूरी तरह
दूसरे में विलीन नहीं होता।
हर एक के भीतर
एक सूक्ष्म अकेलापन है,
जहाँ वह स्वयं को
लगातार पुनः रचती है
mitosis के चक्र में,
जन्म, विभाजन, पुनर्जन्म।
ऋषियों ने शायद इसी को
“अहं का बीज” कहा होगा
जहाँ अस्तित्व
स्वयं को अलग पहचानता है,
पर उसी अलगाव में
सम्पूर्णता की तलाश भी करता है।
कोशिकाओं का यह एकांत
न तो शोक है,
न ही अभिशाप,
बल्कि यह आवश्यक दूरी है,
जिससे जीवन की समरसता
संभव हो पाती है।
क्योंकि यदि सब कुछ
एक हो जाए,
तो न कोई धड़कन बचेगी,
न कोई विचार
बस एक ठहरा हुआ शून्य।
इसलिए
हर कोशिका अकेली है
पर उसी अकेलेपन में
वह पूरे शरीर की कहानी लिखती है।
और शायद…
मनुष्य भी
इन्हीं कोशिकाओं का विस्तार है
भीड़ में रहते हुए भी
अपने भीतर
एक सूक्ष्म, वैज्ञानिक,
और गहरा एकांत लिए हुए।
मुकेश ,,,,,
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