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Thursday, 2 April 2026

गर्भनाल : जीवन और शून्य के बीच की जीवित डोर

 गर्भनाल : जीवन और शून्य के बीच की जीवित डोर

गर्भ के अंधेरे जल में

जहाँ समय अभी धड़कना सीख रहा होता है,

वहीं एक सूक्ष्म-सी नदी बहती है

न कोई तट, न कोई किनारा,

बस माँ और शिशु के बीच

एक अदृश्य संवाद का पुल

उसे ही कहते हैं गर्भनाल।


यह कोई साधारण डोरी नहीं,

यह जैविक कविता है

जिसमें रक्त की स्याही से लिखा जाता है

जीवन का पहला अध्याय।


विज्ञान कहता है

यह नाल, placenta से जुड़ी होती है,

जहाँ कोशिकाएँ

ब्रह्मांड के नियमों की तरह

निरंतर विनिमय करती हैं

ऑक्सीजन, ग्लूकोज़, प्रोटीन,

और साथ ही माँ की भावनाओं की

अदृश्य तरंगें भी।


तीन रक्त-वाहिकाओं का संगीत

दो धमनियाँ, एक शिरा

जैसे त्रिवेणी का संगम

जहाँ शरीर, चेतना और संस्कार

एक साथ प्रवाहित होते हैं।


ऋषियों ने शायद इसी को

“प्राण का प्रथम सेतु” कहा होगा,

जहाँ आत्मा

शरीर से पहली बार परिचय करती है।


गर्भनाल

वह धड़कता हुआ मंत्र है

जो बिना उच्चारण के

शिशु को जीवन सिखाता है।


हर स्पंदन में छिपा है

एक शोध

कि कैसे एक शरीर

दूसरे शरीर को गढ़ता है,

कैसे एक स्त्री

अपनी धड़कनों को बाँटकर

एक नई धड़कन रचती है।


और जब जन्म का क्षण आता है

वह डोर, जो अब तक जीवन थी,

काट दी जाती है

एक चुप्पी के साथ।


पर क्या सच में कटती है?


नहीं

वह नाल शरीर से अलग होती है,

पर स्मृति में, संस्कारों में,

और उस अदृश्य ऊर्जा में

सदैव जुड़ी रहती है।


गर्भनाल

वह केवल जैविक संरचना नहीं,

बल्कि

सम्बन्ध का पहला सूत्र है,

जहाँ से शुरू होती है

मनुष्य होने की यात्रा।


और शायद…

हर बार जब हम किसी से

निर्मल प्रेम करते हैं,

तो कहीं न कहीं

उसी गर्भनाल की प्रतिध्वनि

हमारे भीतर फिर से धड़कती है।


मुकेश ,,,,,,,

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