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Saturday, 18 April 2026

मनीषी” — सर्वज्ञ, अन्तःकरण-नियन्ता ब्रह्म का स्वरूप (अष्टम मन्त्र का शांकरार्थ)

 “मनीषी” — सर्वज्ञ, अन्तःकरण-नियन्ता ब्रह्म का स्वरूप (अष्टम मन्त्र का शांकरार्थ)

मूल पदांश (संशोधित रूप में)

मनीषी = मनसः ईशिता, सर्वज्ञः, ईश्वरः इत्यर्थः।

“मनीषी” का अर्थ है—मन का स्वामी, सब कुछ जानने वाला (सर्वज्ञ), अर्थात् ईश्वर।

यह भाष्यांश ईशावास्योपनिषद् के अष्टम मन्त्र में प्रयुक्त “मनीषी” पद की शांकर-व्याख्या है। यहाँ शंकराचार्य ब्रह्म के उस स्वरूप को स्पष्ट करते हैं, जो केवल साक्षी ही नहीं, बल्कि अन्तःकरण का नियन्ता और सर्वज्ञ सत्ता भी है।

“मनीषी” शब्द की व्युत्पत्ति शंकराचार्य “मनसः ईशिता” के रूप में करते हैं—

अर्थात् वह जो मन का ईश्वर (नियन्ता) है।


यहाँ “मन” से अभिप्राय केवल विचार-शक्ति नहीं, बल्कि सम्पूर्ण अन्तःकरण (मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार) है।

जीव के सभी संकल्प-विकल्प, निर्णय, स्मृति और अहंता—इन सबका आधार यही अन्तःकरण है।


किन्तु यह अन्तःकरण स्वयं प्रकाशमान नहीं है;

यह जड़ (अचेतन) है और आत्मा के चैतन्य से प्रकाशित होकर ही कार्य करता है।

अतः “मनीषी” वह है

जो मन को प्रकाशित करता है

जो मन के सभी कार्यों का साक्षी है

और जो उसे नियंत्रित करने की अंतिम सत्ता है


इसी कारण शंकराचार्य इसे “सर्वज्ञ” भी कहते हैं।


यहाँ “सर्वज्ञता” का अर्थ यह नहीं कि ब्रह्म अलग-अलग वस्तुओं को क्रमशः जानता है,

बल्कि वह स्वरूपतः ज्ञानस्वरूप है—

उसके लिए कुछ भी अज्ञात नहीं, क्योंकि वही सभी ज्ञान का आधार है।


अब “ईश्वर” शब्द का प्रयोग भी महत्वपूर्ण है।

यहाँ शंकराचार्य यह संकेत करते हैं कि—

जब वही ब्रह्म माया-उपाधि के साथ देखा जाता है, तब वह “ईश्वर” (जगत् का नियन्ता) कहलाता है।

अर्थात्,


निरुपाधिक दृष्टि से वही ब्रह्म शुद्ध आत्मा है

और उपाधिक दृष्टि से वही ईश्वर है


इस प्रकार, “मनीषी” पद ब्रह्म की उस सत्ता को प्रकट करता है, जो—


अन्तःकरण का अधिष्ठाता है

समस्त ज्ञान का आधार है

और जगत् का नियामक है


एक दृष्टांत से इसे समझा जा सकता है—

जैसे विद्युत् (electricity) विभिन्न यंत्रों को चलाती है, परंतु स्वयं उन यंत्रों का अंग नहीं होती,

वैसे ही आत्मा मन और बुद्धि को संचालित करती है, परंतु उनसे बंधी नहीं होती।

इस प्रकार, “मनीषी” पद ब्रह्म की अन्तर्यामित्व (inner controller) और सर्वज्ञता को व्यक्त करता है।

“मनीषी” पद के माध्यम से शंकराचार्य ब्रह्म को मन का स्वामी, सर्वज्ञ और ईश्वर के रूप में निरूपित करते हैं। वह अन्तःकरण का अधिष्ठाता और सभी ज्ञान का मूल आधार है। इस प्रकार, ब्रह्म केवल साक्षी ही नहीं, बल्कि समस्त मानसिक और बौद्धिक प्रक्रियाओं का नियन्ता भी है—यही अद्वैत वेदान्त की गूढ़ समझ है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,

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