टूटी कंघी
1
टूटी कंघी
दराज़ में पड़ी है,
जैसे कोई रिश्ता
धीरे-धीरे छूट गया हो।
2
उसके दाँतों में
कहीं-कहीं खाली जगह है,
जैसे बातों के बीच
खामोशी आ गई हो।
3
कभी बालों में
आसानी से चलती थी,
अब उलझनों में
खुद अटक जाती है।
4
हाथ में लो तो
पहचान अब भी वही है,
बस साथ निभाने की
ताकत कम हो गई है।
5
उस पर जमे बाल
कुछ कहानियाँ हैं,
जो हर सुबह
सँवरते-सँवरते रह गईं।
6
नई कंघी
साफ़-सुथरी रखी है,
पर ये पुरानी
स्पर्श का इतिहास जानती है।
7
टूटकर भी
फेंकी नहीं गई,
शायद यादों का
कोई सिरा जुड़ा है।
8
आईने के पास
चुपचाप पड़ी रहती है,
जैसे खुद को
अब कम ही देखती हो।
9
कभी कोई
उसे फिर उठा लेता है,
और वो
थोड़ी देर के लिए
फिर काम आ जाती है।
10
टूटी कंघी
सिर्फ़ एक चीज़ नहीं,
थोड़ा-सा बीता हुआ समय,
जो अभी भी
सँवरना चाहता है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,,
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