विद्या” शब्द का परमात्मज्ञान में ग्रहण – उपासनावाक्यों की अनुपपत्ति
मूल वाक्य (संशोधित)
“विद्याशब्देन परमात्मविज्ञानग्रहणे, ‘हिरण्मयेन पात्रेण…’ इत्यादिना द्वारमार्गादियाचनम् अनुपपन्नं स्यात्।”
पदच्छेद व अन्वय
विद्या-शब्देन — “विद्या” शब्द से
परमात्म-विज्ञान-ग्रहणे — यदि परमात्मज्ञान (ब्रह्मज्ञान) का ग्रहण किया जाए
हिरण्मयेन पात्रेण… इत्यादिना — “हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम्…” आदि मन्त्रों द्वारा
द्वार-मार्ग-आदि-याचनम् — मार्ग, द्वार आदि की प्रार्थना (देवता से निवेदन)
अनुपपन्नं स्यात् — असंगत (तर्कहीन) हो जाएगा
भावार्थ (सरल हिन्दी)
यदि “विद्या” शब्द का अर्थ परमात्मज्ञान (ब्रह्मज्ञान) लिया जाए,
तो उपनिषद् में जो “हिरण्मयेन पात्रेण…” आदि मन्त्रों में
मार्ग, द्वार, प्रकाश आदि के लिए प्रार्थना की गई है,
वह असंगत (अनुपपन्न) हो जाएगी।
भाष्य (शंकर-मतानुसार)
यहाँ आदि शंकराचार्य एक महत्वपूर्ण भेद स्पष्ट करते हैं:
१. “विद्या” का अर्थ क्या है?
यदि “विद्या” = परमात्मज्ञान माना जाए, तो—
ब्रह्मज्ञान में कोई “मार्ग”, “द्वार”, “प्राप्ति-प्रक्रिया” नहीं होती
वह तत्क्षण, स्वानुभव है
इसलिए:
किसी देवता से “मार्ग दिखाओ”, “आवरण हटाओ” — यह प्रार्थना निरर्थक हो जाएगी
२. “हिरण्मयेन पात्रेण…” मन्त्र का संकेत
यह मन्त्र ईशावास्योपनिषद् में आता है—
“हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम्…”
यहाँ साधक:
सूर्य/देवता से प्रार्थना करता है
कि “सत्य का आवरण हटाओ, मुझे मार्ग दो”
यह स्पष्ट रूप से उपासना (देवयान मार्ग) का प्रसंग है
न कि निर्गुण ब्रह्मज्ञान का
३. निष्कर्ष: “विद्या” यहाँ क्या है?
अतः—
यहाँ “विद्या” = उपासना/देवता-ज्ञान
न कि परमात्मज्ञान
४. दार्शनिक भेद
पक्ष उपासना (विद्या यहाँ) ब्रह्मज्ञान
साधन प्रार्थना, मार्ग, देवता आत्मानुभव
प्रक्रिया क्रमिक तत्क्षण
परिणाम देवयान, आपेक्षिक अमृत मोक्ष
गूढ़ संकेत
शंकराचार्य सावधान करते हैं:
यदि “विद्या” का अर्थ ठीक से न समझा जाए,
तो साधक उपासना को ही अंतिम सत्य मान बैठेगा।
अंतिम निष्कर्ष
“विद्या” शब्द यहाँ परमात्मज्ञान नहीं है
बल्कि उपासना-रूप ज्ञान है
क्योंकि उसमें “मार्ग”, “प्रार्थना”, “द्वार” आदि की कल्पना संभव है
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,
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