अमृतम्” का आपेक्षिक अर्थ (अमृतमरदत इत्यपेक्षिकममृतम्)
“अमृतम् अरदत् इति — आपेक्षिकम् अमृतम्।”
पदच्छेद व अर्थ
अमृतम् — अमरत्व, मृत्यु का अभाव
अरदत् (अश्नुत/प्राप्नोति भाव) — प्राप्त करता है
इति — ऐसा कहा गया है
आपेक्षिकम् अमृतम् — सापेक्ष (relative) अमरत्व
यहाँ “अमृत” शब्द का अर्थ परम, शाश्वत ब्रह्मानुभवजन्य अमरत्व नहीं है,
बल्कि एक सापेक्ष (सीमित) अमरत्व है।
भाष्य (शंकर-मतानुसार)
आदि शंकराचार्य इस वाक्य के माध्यम से एक अत्यंत महत्वपूर्ण भेद स्पष्ट करते हैं:
१. “अमृत” के दो स्तर
(क) आपेक्षिक अमृत (Relative Immortality)
देवता-लोक की प्राप्ति
दीर्घकालीन सुख
पुनर्जन्म से तत्काल मुक्ति
परंतु यह अंतिम नहीं है
काल समाप्त होने पर पुनः संसार में आगमन
(ख) परम अमृत (Absolute Immortality)
आत्मज्ञान से प्राप्त
ब्रह्मस्वरूप की अनुभूति
पूर्ण मोक्ष
यह नित्य, अविनाशी है
२. यहाँ “अमृत” क्यों आपेक्षिक है?
ईशावास्योपनिषद् के प्रसंग में—
“अविद्या (कर्म/उपासना)” से जो फल मिलता है
उसे “अमृत” कहा गया है
परंतु—
वह केवल दीर्घकालिक फल है
न कि अंतिम मोक्ष
३. दार्शनिक संकेत
शंकराचार्य यह सावधानी बरतते हैं कि—
कहीं साधक “देवलोक” या “स्वर्ग” को ही अंतिम लक्ष्य न समझ ले
इसलिए वे स्पष्ट करते हैं:
वह “अमृत” केवल नाममात्र (उपचारिक) है
वास्तविक अमृत तो केवल ब्रह्मज्ञान से है
उदाहरण से समझें
जैसे कोई व्यक्ति कहे:
“यह औषधि अमृत है”
→ मतलब: बहुत लाभकारी, पर वास्तव में अमरत्व नहीं देती
उसी प्रकार—
कर्मफल से प्राप्त “अमृत”
→ केवल उपचारिक/आपेक्षिक है
“अमृत” शब्द का प्रयोग यहाँ सापेक्ष अर्थ में हुआ है
वास्तविक अमृतत्व केवल आत्मज्ञान से ही संभव है
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,
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