विद्योत्पत्ति में अविद्या-नाश तथा कर्म-अनुपपत्ति
मूल पाठ (संशोधित रूप में)
प्रकाशश्चेति — विज्ञानोत्पत्तौ यस्मिन्नाश्रये तदुत्पन्नं, तस्मिन्नेव आश्रये शीतोऽग्निरप्रकाशो वा इति न युक्तम्।
अविद्याया उत्पत्तिनापि संशयः; अज्ञानमेव।
‘यस्मिन् सर्वाणि भूतानि आत्मैवाभूद् विजानतः, तत्र को मोहः कः शोकः एकत्वमनुपश्यतः’ इति शोक-मोहाद्यसंभव-श्रुतेः।
अविद्याऽसंभवात् तदुपादानस्य कर्मणोऽपि अनुपपत्तिम् अवोचाम।”**
पदच्छेद व अन्वय
विज्ञान-उत्पत्तौ — आत्मज्ञान के उत्पन्न होने पर
यस्मिन् आश्रये — जिस आत्मा में
तत् उत्पन्नम् — वह ज्ञान उत्पन्न हुआ
तस्मिन् एव आश्रये — उसी आश्रय में
शीतः अग्निः वा, अप्रकाशः वा — क्या अग्नि शीतल या प्रकाशहीन हो सकती है? (नहीं)
अविद्याया उत्पत्तिना अपि संशयः — अविद्या के पुनः उत्पन्न होने का भी संशय नहीं
अज्ञानम् एव — वह केवल अज्ञान ही है (जो ज्ञान से नष्ट हो चुका)
श्रुति प्रमाण
“यस्मिन् सर्वाणि भूतानि आत्मैवाभूद् विजानतः,
तत्र को मोहः कः शोकः, एकत्वम् अनुपश्यतः।”
ईशावास्योपनिषद् (मन्त्र ७)
भावार्थ (सरल हिन्दी)
जब आत्मज्ञान उत्पन्न होता है, तो जिस आत्मा में वह ज्ञान प्रकट हुआ है, उसी में अविद्या का पुनः रहना असंभव है।
जैसे—
अग्नि शीतल नहीं हो सकती
प्रकाश अंधकारयुक्त नहीं हो सकता
उसी प्रकार—
ज्ञान होने पर अज्ञान का अस्तित्व नहीं रहता
और श्रुति भी कहती है—
जिसने सबमें आत्मा का एकत्व देख लिया
उसके लिए न मोह रहता है, न शोक
भाष्य (शंकर-मतानुसार)
यहाँ आदि शंकराचार्य का तात्पर्य अत्यंत स्पष्ट है:
१. ज्ञान का स्वभाव
ज्ञान = प्रकाश
इसका कार्य = अविद्या का पूर्ण नाश
इसलिए:
जहाँ ज्ञान उत्पन्न हुआ
वहाँ अविद्या का पुनः स्थान नहीं
२. अविद्या की पुनरुत्पत्ति असंभव
अविद्या कोई वास्तविक सत्ता नहीं
यह केवल अज्ञान (अभावरूप) है
ज्ञान होने पर:
यह नष्ट हो जाती है
पुनः उत्पन्न नहीं होती
३. श्रुति द्वारा समर्थन
मन्त्र ७ का आशय:
जब एकत्व-दर्शन होता है
तब—
मोह (delusion) ❌
शोक (sorrow) ❌
इससे सिद्ध:
अविद्या का पूर्ण अभाव
४. कर्म की भी अनुपपत्ति
“अविद्याऽसंभवात् तदुपादानस्य कर्मणोऽपि अनुपपत्तिः”
अर्थ:
कर्म का आधार = अविद्या (कर्तृत्व-भाव)
जब अविद्या ही नहीं रही
तो—
कर्म भी असंभव हो जाता है
दार्शनिक निष्कर्ष
ज्ञान के उदय पर
अविद्या ❌
मोह ❌
शोक ❌
कर्म ❌
केवल शुद्ध आत्मस्वरूप शेष रहता है
गूढ़ संकेत
जब तक “मैं करता हूँ” है — तब तक संसार है
जब “मैं ही सब हूँ” का अनुभव होता है — तब कुछ करना शेष नहीं रहता
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
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