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Tuesday, 21 April 2026

विद्या–अविद्या के क्रम-सहअस्तित्व का खंडन

 क्रमेण एकाश्रये स्यातां विद्याविद्ये इति चेत् — न।

विद्योत्पत्तौ अविद्याया नाशत्वात्, तदाश्रयेऽवस्थानुपपत्तेः।

न हि अग्निः शीतः।”


पदच्छेद व अन्वय

क्रमेण — क्रम से

एकाश्रये — एक ही आश्रय (आत्मा) में

स्याताम् विद्याविद्ये — विद्या और अविद्या हो सकती हैं

इति चेत् — यदि ऐसा कहा जाए

न — नहीं

विद्योत्पत्तौ — ज्ञान के उत्पन्न होने पर

अविद्याया नाशत्वात् — अविद्या का नाश हो जाने के कारण

तदाश्रये — उसी आश्रय में

अवस्थान-अनुपपत्तेः — ठहरना असंभव है

न हि अग्निः शीतः — अग्नि कभी शीतल नहीं होती

भावार्थ (सरल हिन्दी)


यदि कोई कहे कि विद्या (ज्ञान) और अविद्या (अज्ञान) एक ही आत्मा में क्रम से रह सकते हैं —

तो यह मान्य नहीं है।


क्योंकि जैसे ही ज्ञान उत्पन्न होता है, अविद्या का नाश हो जाता है।

इसलिए दोनों का एक ही आश्रय में रहना असंभव है।

जैसे अग्नि कभी ठंडी नहीं हो सकती।


यहाँ आदि शंकराचार्य यह सिद्ध करते हैं कि—

विद्या और अविद्या का संबंध

सह-अस्तित्व का नहीं, बल्कि नाशक–नाश्य का है

विद्या (आत्मज्ञान) उत्पन्न होते ही

अविद्या (अज्ञान/कर्माधार) का पूर्ण नाश कर देती है

अतः “क्रम से एक ही आश्रय में दोनों रहेंगे” — यह भी तर्कसंगत नहीं


उपमा का गूढ़ अर्थ

“न हि अग्निः शीतः”

अग्नि का स्वभाव = उष्णता

ज्ञान का स्वभाव = अविद्या-नाश


इसलिए:

अग्नि + शीतलता ❌

ज्ञान + अविद्या ❌


ईशावास्योपनिषद् के इस प्रसंग में निष्कर्ष स्पष्ट है:

ज्ञान और अविद्या का “समुच्चय” असंभव है

क्योंकि ज्ञान का उदय ही अविद्या का अंत है


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,,

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