“प्राण-लय और उपाधि-त्याग: मरणावस्था में समष्टि-संप्राप्ति का शांकर-विवेचन”
शुद्ध पदांश (संभावित पुनर्निर्माण)
“वायुरिति। अथ इदानीं मम मरिष्यतः वायुः प्राणः अध्यात्म-परिच्छेदं हित्वा अधिदेवतात्मानं सर्वगतं अनिलम् अमृतं प्रतिपद्यतामिति वाक्यशेषः। लिङ्गं चेदं ज्ञानकर्मणोः (समुच्चयस्य)।”
अन्वय
अथ इदानीं मम मरिष्यतः (अस्मात् देहात् निर्गच्छतः) वायुः प्राणः अध्यात्म-परिच्छेदं हित्वा अधिदेवत-आत्मानं सर्वगतं अनिलम् अमृतं प्रतिपद्यताम। इति वाक्यशेषः। एतत् ज्ञानकर्मणोः (समुच्चयस्य) लिङ्गम्।
अब जब मैं इस शरीर को छोड़ने वाला हूँ, तब यह मेरा प्राण अपने व्यक्तिगत (शारीरिक) सीमित स्वरूप को त्यागकर सर्वव्यापक, अमृत स्वरूप समष्टि-वायु में लीन हो जाए—यह इस वाक्य का अभिप्राय है।
और यह भाव ज्ञान तथा कर्म के समुच्चय का भी संकेत करता है।
“वायुरिति”—इस पद में ही सम्पूर्ण तात्त्विक संकेत निहित है। “वायु” शब्द यहाँ प्राण का वाचक है—“प्राणो वै वायुः” इति श्रुतेः। प्राण ही जीव के सूक्ष्म शरीर का मुख्य संचालक तत्त्व है, जो देह, इन्द्रिय और मन को क्रियाशील बनाए रखता है।
“अथ इदानीं मम मरिष्यतः”—यह वचन साधक की उस जागरूकता का द्योतक है, जिसमें वह मरण को केवल देह-विनाश न मानकर, एक गम्भीर आध्यात्मिक संक्रमण के रूप में देखता है। “मरिष्यतः” इति—देहाभिमान-त्यागस्य पूर्वभूमिका।
“वायुः प्राणः अध्यात्म-परिच्छेदं हित्वा”—
यहाँ “अध्यात्म-परिच्छेद” का अभिप्राय है—देह, इन्द्रिय और मन के द्वारा आरोपित वह सीमितता, जिसके कारण जीव स्वयं को ‘अहं देहः’ इति मानता है। “हित्वा”—त्याग करके।
अतः व्यष्टि-प्राण अपनी सीमितता का परित्याग करता है। यह शंकरमत में अत्यन्त महत्वपूर्ण सिद्धान्त है—
उपाधि-परिच्छेद एव बन्धः
और उसका लोप ही मुक्ति का प्रथम संकेत है।
“अधिदेवतात्मानं प्रतिपद्यताम्”—
“अधिदेवत” शब्द यहाँ समष्टि-सत्ता का द्योतक है, जिसे हिरण्यगर्भ या वैश्वानर भी कहा जाता है। व्यष्टि का समष्टि में लय—यह कार्य का कारण में विलय है।
यहाँ साधक का भाव है—मेरा प्राण अपने कारण, उस सार्वभौम प्राण में विलीन हो जाए।
“सर्वगतं अनिलम् अमृतम्”—
“अनिल” = जो किसी एक स्थान में न बँधा हो, सर्वव्यापक।
“अमृत” = जो नश्वरता से रहित हो।
अतः यह उस सार्वभौम चेतन-तत्त्व की ओर संकेत है, जो समस्त प्राण-शक्ति का आधार है। किन्तु यह अभी भी उपासना-गोचर ब्रह्म है, न कि निर्गुण परब्रह्म का प्रत्यक्ष बोध।
“लिङ्गं चेदं ज्ञानकर्मणोः”—गूढ़ संकेत
यह पद विशेष दार्शनिक महत्व रखता है। “लिङ्ग” का अर्थ है—संकेत या द्योतक।
यहाँ यह मन्त्र ज्ञान और कर्म के समुच्चय का संकेत करता है।
कैसे?
“अध्यात्म-परिच्छेद-त्याग” → ज्ञान की दिशा
“प्राण का अधिदेवत में लय” → उपासना (विद्या)
(पूर्व मन्त्र से) “कृतं स्मर” → कर्म का अंग
अतः यह स्पष्ट होता है कि साधक अभी उस अवस्था में है जहाँ—
अविद्या (कर्म) और विद्या (उपासना) का समन्वय विद्यमान है।
किन्तु शंकराचार्य के अनुसार—
कर्म और उपासना मोक्ष के साधन नहीं, अपितु ज्ञान की तैयारी (चित्तशुद्धि) के साधन हैं।
मोक्ष का साधन केवल आत्मज्ञान है—“न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते”।
प्रवृत्ति–निवृत्ति एवं संक्रमण
यह पदांश साधक की यात्रा को सूक्ष्म रूप से प्रकट करता है—
“कृतं स्मर” → प्रवृत्ति (कर्ममार्ग)
“प्राण-लय” → निवृत्ति की ओर गमन
इस प्रकार यह अवस्था एक संक्रमण-बिन्दु है—
कर्म से उपासना, और उपासना से ज्ञान की ओर।
जब साधक देखता है कि—
शरीर नश्वर है
प्राण भी परिवर्तनशील है
कर्म बन्धनकारक हैं
तब वह इन सबका अतिक्रमण कर आत्मतत्त्व की खोज करता है।
अद्वैत सिद्धान्त की परिणति
यद्यपि यहाँ प्रत्यक्ष रूप से अद्वैत का प्रतिपादन नहीं है, तथापि—
“परिच्छेद-त्याग” → सीमाओं का लोप
“सर्वगत अनिल” → व्यापकता का बोध
ये दोनों मिलकर अन्ततः उस सत्य की ओर इंगित करते हैं जहाँ—
न जीव है, न ईश्वर का भेद
न व्यष्टि, न समष्टि
केवल एक अद्वितीय चैतन्य
शंकरमत का निष्कर्ष—
“जीवो ब्रह्मैव नापरः”—यही यहाँ अप्रत्यक्ष रूप से प्रतिपादित है।
यह भाष्य यह सिखाता है कि मृत्यु केवल अन्त नहीं, बल्कि अहंता और उपाधियों के विसर्जन की प्रक्रिया है।
शरीर भस्म होता है—अनित्य का बोध
प्राण समष्टि में लीन होता है—सूक्ष्म का अतिक्रमण
कर्म स्मरण में आते हैं—बन्धन का उद्घाटन
और इन सबके परे जो शेष है—
वही शुद्ध, निरुपाधिक, अद्वैत आत्मा है।
अतः—
साधक को चाहिए कि वह उपाधियों का त्याग कर,
ज्ञान की ओर अग्रसर होकर,
उसी अमृत, अभेद ब्रह्म में स्थित हो जाए—
यही ईशावास्योपनिषद् का परम रहस्य है।
मुकेश ,,,,,,,
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