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Tuesday, 21 April 2026

भस्मीभाव और देह-अनित्यत्व: याचनासामर्थ्य से निवृत्ति की शांकर-दृष्टि”

 भस्मीभाव और देह-अनित्यत्व: याचनासामर्थ्य से निवृत्ति की शांकर-दृष्टि”

शुद्ध पदांश (संभावित पुनर्निर्माण)

“संसृष्टत्वमिति द्रष्टव्यम्, मार्ग-याचन-असामर्थ्यात्। अथेदं शरीरम् अग्नौ हुतं भस्मान्तं भूयात्।”

अन्वय

संसृष्टत्वम् इति द्रष्टव्यम्, मार्ग-याचन-असामर्थ्यात्। अथ इदं शरीरम् अग्नौ हुतं भस्मान्तं भूयात्।

यह समझना चाहिए कि (जीव) संयोगों से बँधा हुआ है, और (मरणकाल में) मार्ग की याचना करने में असमर्थ हो जाता है। इसलिए यह शरीर अग्नि में अर्पित होकर भस्म (राख) हो जाए।


इस पदांश में उपनिषद् अत्यन्त सूक्ष्म ढंग से जीव की अवस्था-परिवर्तन और देह के अनित्यत्व का प्रतिपादन करता है।

“संसृष्टत्वमिति द्रष्टव्यम्”—

“संसृष्टत्व” शब्द का अभिप्राय है—उपाधियों के साथ संयोग, देह–इन्द्रिय–मनादि के साथ जीव का मिथ्या-सम्बन्ध।

यहाँ “द्रष्टव्यम्”—अवश्य ज्ञातव्य, विवेचनीय।

अर्थात्—जीव वास्तव में शुद्ध आत्मा होते हुए भी, अज्ञानवश उपाधियों से संसृष्ट प्रतीत होता है।

शंकराचार्य के मत में—

“अविद्योपाधि-संयोगात् जीवभावः”

यह संसृष्टता ही बन्धन का कारण है।

“मार्ग-याचन-असामर्थ्यात्”—

यहाँ गूढ़ संकेत है कि मरणकाल में जीव की स्वायत्तता लुप्त हो जाती है।

वह न तो मार्ग का चयन कर सकता है, न ही स्वतंत्र रूप से गति का निर्धारण—

कर्मणा नियतः गमनः


अतः “मार्ग-याचन” (देवयान या पितृयान की प्राप्ति) भी उसके वश में नहीं रहती।

यह कर्मबन्धन की परतन्त्रता को सूचित करता है।


यहाँ शंकरमत का एक महत्वपूर्ण तत्त्व प्रकट होता है—

कर्तृत्वाभिमान मिथ्या है, क्योंकि अन्ततः जीव कर्माधीन ही है।


“अथेदं शरीरम् अग्नौ हुतं भस्मान्तं भूयात्”—

यहाँ देह के अन्तिम संस्कार का दार्शनिक अर्थ व्यक्त किया गया है।


“अग्नौ हुतम्” = यज्ञ में आहुति के समान अर्पित

“भस्मान्तम्” = जिसका अन्त भस्म में हो

यह केवल शारीरिक दाह-संस्कार नहीं, अपितु यह संकेत है कि—

यह शरीर, जो पंचभूतों का संघात है, पुनः अपने कारण में विलीन हो जाए।


शंकराचार्य की दृष्टि में—

देह नित्य नहीं, अपितु अनात्म है।

अतः उसका भस्मीकरण वास्तव में अनात्म-निरसन का प्रतीक है।

तात्त्विक विवेचन

यह पदांश तीन स्तरों पर विचार प्रस्तुत करता है—


1. संसृष्टता (उपाधि-संयोग)

जीव का देह से सम्बन्ध वास्तविक नहीं, अपितु अविद्या-जन्य है।

यह “संसृष्टत्व” ही संसार का मूल कारण है।


2. असामर्थ्य (कर्माधीनता)

जीव अपने कर्मों से बँधा हुआ है—

न वह स्वतन्त्र है

न मरणकाल में कुछ नया कर सकता है

अतः यह अवस्था अविद्या और कर्म के बन्धन को उद्घाटित करती है।


3. देह-नाश (भस्मीभाव)

देह का भस्म होना यह सिखाता है कि—

जो नश्वर है, वह आत्मा नहीं हो सकता।

विद्या–अविद्या एवं प्रवृत्ति–निवृत्ति सन्दर्भ

यहाँ—

“संसृष्टत्व” → अविद्या का क्षेत्र

“भस्मान्तं शरीरम्” → निवृत्ति का संकेत

अतः यह पदांश साधक को प्रेरित करता है कि वह—


प्रवृत्ति (कर्म, देहाभिमान) से निवृत्ति (वैराग्य, आत्मविचार) की ओर अग्रसर हो।

अद्वैत सिद्धान्त की प्रतिष्ठा

इस सम्पूर्ण विवेचन का लक्ष्य यह है कि—

जो संसृष्ट है, वह मिथ्या है

जो भस्म हो जाता है, वह आत्मा नहीं है

अतः आत्मा न देह है, न इन्द्रिय, न मन—


वह शुद्ध, निरुपाधिक, साक्षी चैतन्य है।

शंकराचार्य का निष्कर्ष—

“नेति नेति”—इसका निरूपण यहाँ अप्रत्यक्ष रूप से होता है।


यह पदांश साधक को यह गम्भीर शिक्षा देता है कि—

देह के साथ तादात्म्य ही बन्धन है

कर्म के अधीनता ही असामर्थ्य है

और इन दोनों का अतिक्रमण ही मुक्ति का मार्ग है

अतः—

शरीर का भस्म होना केवल एक भौतिक घटना नहीं,

बल्कि यह आत्मबोध की दिशा में एक गूढ़ संकेत है—


कि जो नश्वर है, उसे त्यागकर

जो अमृत, अविनाशी और अद्वैत है—उसी में स्थित होना चाहिए।


यही वेदान्त का परम पुरुषार्थ है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,,

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