“ॐ-प्रतीक, अग्नि-उपासना और कर्मस्मरण: अन्त्यचेतना का शांकर-विवेचन”
शुद्ध पदांश (संभावित पुनर्निर्माण)
“ॐ इति यथोपासनं प्रतीकात्मकत्वात् सत्यब्रह्मणोऽग्न्याख्यं ब्रह्माभिधीयते।
हे क्रतो संकल्पात्मक! स्मर यन्मया स्मर्तव्यं, तस्य कालोऽयमुपस्थितः; अतः स्मर।
एतावन्तं कालं यत् कृतं कर्म, तत् स्मर।
हे अग्ने! स्मर यत् मया बाल्यप्रभृति कृतं कर्म, तत् स्मर।
क्रतो स्मर कृतं स्मरेति पुनर्वचनम् आदरार्थम्॥”
अन्वय
ॐ इति यथोपासनम्, प्रतीकात्मकत्वात् सत्यब्रह्मणः अग्न्याख्यं ब्रह्म अभिधीयते।
हे क्रतो संकल्पात्मक! यत् मया स्मर्तव्यं, तस्य कालः अयम् उपस्थितः; अतः स्मर।
एतावन्तं कालं यत् कृतं कर्म, तत् स्मर।
हे अग्ने! मया बाल्यप्रभृति कृतं कर्म, तत् स्मर।
“क्रतो स्मर कृतं स्मर” इति पुनर्वचनम् आदरार्थम्।
“ॐ” यह ब्रह्म का प्रतीक है, और उपासना के लिए अग्नि को ब्रह्म के रूप में माना गया है।
हे संकल्प-स्वरूप अन्तःकरण! अब समय आ गया है, इसलिए जो कुछ स्मरण करना चाहिए उसे स्मरण करो।
अब तक जीवन में जो भी कर्म किए हैं, उन्हें स्मरण करो।
हे अग्नि! मेरे द्वारा बाल्यकाल से किए गए कर्मों को स्मरण करो।
“स्मरण करो, स्मरण करो”—यह पुनरुक्ति आदर और आग्रह के कारण है।
इस पदांश में उपनिषद् मरणासन्न साधक की अन्तिम साधना का सूक्ष्म निरूपण करता है, जहाँ उपासना, कर्म और स्मृति—तीनों का संगम होता है।
“ॐ इति यथोपासनम्”—
“ॐ” प्रणव है, जो सम्पूर्ण वेदों का सार और ब्रह्म का प्रतीक है—“ॐ इत्येतदक्षरं ब्रह्म”।
यहाँ “यथोपासनम्”—जैसी उपासना की गई है, उसी के अनुसार फल की प्राप्ति होती है।
“प्रतीकात्मकत्वात्”—
यहाँ एक अत्यन्त महत्वपूर्ण सिद्धान्त प्रकट होता है—प्रतीक-उपासना।
साधक प्रत्यक्ष निर्गुण ब्रह्म का ध्यान करने में असमर्थ होने से, अग्नि, सूर्य आदि प्रतीकों में ब्रह्म का आरोप करता है।
“सत्यब्रह्मणोऽग्न्याख्यं ब्रह्म”—
यहाँ “अग्नि” को ब्रह्म के रूप में उपासित किया गया है।
अग्नि—प्रकाश, ज्ञान और यज्ञ का प्रतीक है।
अतः यह सगुण ब्रह्मोपासना का रूप है।
“हे क्रतो संकल्पात्मक!”—
“क्रतु” शब्द का अर्थ है—संकल्प, बुद्धि, चित्त।
यहाँ साधक अपने ही अन्तःकरण को सम्बोधित करता है—
यह अन्तर्मुखता की चरम अवस्था है।
“स्मर यन्मया स्मर्तव्यं, तस्य कालोऽयमुपस्थितः”—
अब मृत्यु समीप है, अतः जो कुछ स्मरण करना आवश्यक है, उसे स्मरण करो।
यह केवल कर्मों का यांत्रिक स्मरण नहीं, बल्कि—
जीवन की सम्पूर्ण साधना का अन्तिम संकलन है।
“एतावन्तं कालं यत् कृतं कर्म, तत् स्मर”—
यहाँ साधक अपने सम्पूर्ण जीवन के कर्मों को देखता है।
शंकराचार्य के अनुसार—
कर्म ही पुनर्जन्म का कारण हैं
स्मरण से उनके संस्कार जाग्रत होते हैं
यह स्मरण कर्मफल-स्वीकार की चेतना है।
“हे अग्ने! स्मर यत् मया बाल्यप्रभृति कृतं कर्म”—
यहाँ अग्नि को साक्षी और देवता मानकर प्रार्थना की जाती है।
अग्नि—सर्वकर्मसाक्षी है, यज्ञ का भोक्ता और देवताओं का वाहक।
“बाल्यप्रभृति”—बाल्यकाल से लेकर अब तक के समस्त कर्म—
यह सम्पूर्ण जीवन का लेखा-जोखा है।
“क्रतो स्मर कृतं स्मर”—
यह पुनरुक्ति केवल शब्दाभ्यास नहीं, अपितु आदर और तात्कालिकता का बोधक है।
“आदरात् पुनर्वचनम्”—शंकरभाष्य की शैली में यह स्वीकार किया जाता है।
तात्त्विक विवेचन
यह पदांश तीन प्रमुख तत्त्वों को प्रकट करता है—
1. प्रतीक-उपासना (विद्या)
ॐ और अग्नि के माध्यम से ब्रह्म का ध्यान
यह साधक को सूक्ष्मता की ओर ले जाता है
2. कर्म-स्मरण (अविद्या)
कृत कर्मों का स्मरण
कर्मबन्धन का उद्घाटन
3. समुच्चय (विद्या + अविद्या)
यहाँ स्पष्टतः दोनों का समन्वय है—
उपासना और कर्म—दोनों साथ-साथ चल रहे हैं।
प्रवृत्ति–निवृत्ति और संक्रमण
“कृतं स्मर” → प्रवृत्ति (कर्ममार्ग)
“ॐ, अग्नि-उपासना” → निवृत्ति की दिशा
यह साधक की उस स्थिति को दर्शाता है जहाँ—
वह कर्म से ऊपर उठकर उपासना की ओर, और उपासना से ज्ञान की ओर अग्रसर है।
अद्वैत की अन्तर्निहित परिणति
यद्यपि यहाँ सगुण-उपासना का वर्णन है, तथापि—
“प्रतीक” → केवल साधन है
“ब्रह्म” → साध्य
जब साधक प्रतीक से परे जाता है, तब—
न अग्नि रहती है, न उपासक
केवल शुद्ध चैतन्य
यही अद्वैत का चरम बोध है।
यह पदांश साधक को यह शिक्षा देता है कि—
जीवन के अन्तिम क्षण में भी सजगता आवश्यक है
कर्मों का स्मरण बन्धन का बोध कराता है
उपासना मन को एकाग्र करती है
और इन दोनों के पार—
आत्मज्ञान ही परम लक्ष्य है।
अतः—
“स्मरण, उपासना और वैराग्य के माध्यम से
साधक को उस अद्वैत ब्रह्म में स्थित होना चाहिए,
जहाँ न कर्म है, न कर्ता—केवल शुद्ध अस्तित्व-चैतन्य-आनन्द।”
मुकेश ,,,,,,,,,,,,
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