“अग्नि-प्रणीत मार्ग और पाप-क्षय की प्रार्थना: उपासना से ज्ञान की ओर शांकर-दृष्टि”
मन्त्र (ईशावास्योपनिषद् १८)
अग्ने नय सुपथा राये अस्मान्
विश्वानि देव वयुनानि विद्वान्।
युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो
भूयिष्ठां ते नमउक्ति विधेम॥१८॥
अन्वय
हे अग्ने देव! विद्वान् (त्वम्) अस्मान् राये सुपथा नय।
विश्वानि वयुनानि (त्वम्) विद्वान् (असि)।
अस्मत् जुहुराणम् एनः युयोधि।
ते भूयिष्ठां नम-उक्तिं विधेम।
हे अग्नि देव! आप सब मार्गों को जानने वाले हैं, हमें उत्तम मार्ग से धन (या कल्याण) की ओर ले चलिए।
हमारे पापों को दूर कर दीजिए।
और हम आपको बार-बार नमस्कार करते हैं।
यह उपनिषद् का अंतिम मन्त्र है, जो सम्पूर्ण शिक्षाओं का साररूप समाहार प्रस्तुत करता है। यहाँ साधक अन्ततः अग्नि—अर्थात् देवता-रूप ब्रह्म—की शरण में जाकर अपने जीवन की दिशा और शुद्धि की प्रार्थना करता है।
“अग्ने”—
अग्नि यहाँ केवल लौकिक अग्नि नहीं, बल्कि देवता, हिरण्यगर्भ अथवा सगुण ब्रह्म का प्रतीक है।
अग्नि—प्रकाशस्वरूप, ज्ञानस्वरूप, यज्ञ का केन्द्र—अतः वह मार्गदर्शक है।
“नय सुपथा”—
“नय” = ले चलो, मार्गदर्शन करो।
“सुपथा” = शुभ मार्ग, कल्याणकारी पथ।
यहाँ साधक यह स्वीकार करता है कि वह स्वयं मार्ग का ज्ञान नहीं रखता—
अतः देवता की शरण ग्रहण करता है।
यह अविद्या से निवृत्ति की आकांक्षा है।
“राये अस्मान्”—
“रयि” शब्द का अर्थ केवल भौतिक धन नहीं, बल्कि आध्यात्मिक समृद्धि भी है—
यहाँ “रयि” = मोक्ष-लाभ या उच्च लोकप्राप्ति
शंकराचार्य के अनुसार, उपासक के लिए यह क्रममुक्ति का संकेत हो सकता है।
“विश्वानि देव वयुनानि विद्वान्”—
“वयुन” = मार्ग, उपाय, कर्मों के प्रकार, या गूढ़ ज्ञान
“विद्वान्” = जानने वाला
अर्थात्—हे देव! आप समस्त मार्गों, कर्मों और उनके फलों के ज्ञाता हैं।
अतः आप ही हमें उचित दिशा दे सकते हैं।
यहाँ ईश्वर की सर्वज्ञता का प्रतिपादन है।
“युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनः”—
“युयोधि” = दूर करो, नष्ट करो
“जुहुराणम् एनः” = हमारे भीतर स्थित, चिपके हुए पाप
यहाँ साधक अपने पापों के क्षय की प्रार्थना करता है।
शंकरमत में—
पाप = चित्तमल
उसका नाश = ज्ञान के लिए आवश्यक
अतः यह प्रार्थना चित्तशुद्धि की है।
“भूयिष्ठां ते नमउक्ति विधेम”—
“भूयिष्ठाम्” = अत्यधिक, बार-बार
“नमउक्ति” = नमस्कार के वचन
“विधेम” = हम करें
यहाँ साधक पूर्ण समर्पण के साथ देवता की वन्दना करता है।
यह भक्ति और विनय का चरम रूप है।
तात्त्विक विवेचन
यह मन्त्र तीन स्तरों पर साधना को समेटता है—
1. उपासना (विद्या)
अग्नि को मार्गदर्शक मानना
ईश्वर-शरणागति
2. कर्म (अविद्या)
पापों का स्वीकार
उनके क्षय की प्रार्थना
3. समुच्चय
यहाँ दोनों का समन्वय है—
उपासना + कर्मशुद्धि = ज्ञान की तैयारी
प्रवृत्ति–निवृत्ति सन्दर्भ
“राये” → प्रवृत्ति (फल, प्राप्ति की इच्छा)
“सुपथा नय” → निवृत्ति (शुद्ध मार्ग की ओर)
यहाँ साधक प्रवृत्ति से निवृत्ति की ओर उन्मुख है।
उपासना से ज्ञान की ओर संक्रमण
यह मन्त्र स्पष्ट करता है कि—
पहले साधक ईश्वर से मार्गदर्शन माँगता है
फिर अपने पापों के नाश की प्रार्थना करता है
इससे चित्त शुद्ध होता है
और तब वह ज्ञान के योग्य बनता है
अतः यह मन्त्र ज्ञान-प्राप्ति की पूर्वावस्था का सूचक है।
अद्वैत सिद्धान्त की परिणति
यद्यपि यहाँ द्वैतभाव (देव–भक्त) विद्यमान है, तथापि—
यह केवल साधन है
अन्ततः साधक को यह जानना है कि—
वही अग्नि, वही देव, वही मार्ग—सब आत्मा ही है
शंकरमत का निष्कर्ष—
“अहं ब्रह्मास्मि”—यही इस यात्रा का अंतिम लक्ष्य है।
यह अंतिम मन्त्र सम्पूर्ण उपनिषद् का सार प्रस्तुत करता है—
ईश्वर में श्रद्धा
कर्मों का शोधन
मार्ग की प्रार्थना
और समर्पण की भावना
इन सबके माध्यम से साधक—
अविद्या से विद्या की ओर,
और विद्या से आत्मज्ञान की ओर अग्रसर होता है।
अतः—
“हे साधक! शुभ मार्ग का अनुसरण करो,
पापों को त्यागो,
और अन्ततः उस अद्वैत सत्य में स्थित हो जाओ
जहाँ कोई भेद नहीं—केवल एक ब्रह्म है।”
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,,,
No comments:
Post a Comment