“देवयान की अभिलाषा और दक्षिणमार्ग-निवृत्ति: अग्नि-प्रार्थना का शांकर-विवेचन”
शुद्ध पदांश (संभावित पुनर्निर्माण)
“पुनरन्येन मन्त्रेण मार्गं याचते—‘अग्ने नयेति’।
हे अग्ने! नय, गमय सुपथा—शोभनेन मार्गेण।
‘सुपथा’ इति विशेषणं दक्षिणमार्गनिवृत्त्यर्थम्।
निर्विण्णोऽहम् अस्मिन् दक्षिणेन मार्गेण गतागतलक्षणेन; अतः याचे त्वां पुनः पुनः गमनागमनवर्जितेन शोभनेन पथा नय।”
अन्वय
पुनः अन्येन मन्त्रेण मार्गं याचते—“अग्ने नयेति”।
हे अग्ने! सुपथा, शोभनेन मार्गेण (माम्) नय, गमय।
“सुपथा” इति विशेषणं दक्षिणमार्गनिवृत्त्यर्थम्।
अहम् अस्मिन् दक्षिणेन मार्गेण गतागतलक्षणेन निर्विण्णः; अतः त्वां याचे—पुनः पुनः गमनागमनवर्जितेन शोभनेन पथा (माम्) नय।
अब (साधक) दूसरे मन्त्र द्वारा मार्ग की प्रार्थना करता है—“हे अग्नि! मुझे शुभ मार्ग से ले चलो।”
यहाँ “सुपथ” विशेष रूप से उस मार्ग को बताता है जो दक्षिणमार्ग (जन्म–मरण के चक्र वाले मार्ग) से भिन्न है।
मैं इस आने-जाने वाले मार्ग से ऊब चुका हूँ, इसलिए आपसे प्रार्थना करता हूँ कि मुझे उस श्रेष्ठ मार्ग पर ले चलिए जहाँ पुनर्जन्म न हो।
यहाँ उपनिषद् साधक की अन्तःचेतना की परिपक्व अवस्था का सूक्ष्म निरूपण करता है। पूर्व में जहाँ वह केवल मार्गदर्शन की याचना करता था, अब वह विशेष मार्ग की स्पष्ट अभिलाषा प्रकट करता है।
“पुनरन्येन मन्त्रेण मार्गं याचते—‘अग्ने नयेति’”—
यह “पुनः” शब्द अत्यन्त सारगर्भित है। यह केवल पुनरुक्ति नहीं, बल्कि आत्मानुभूति की तीव्रता का सूचक है।
साधक बार-बार उसी प्रार्थना को करता है, क्योंकि अब उसका लक्ष्य स्पष्ट हो गया है—
मुक्ति का मार्ग।
“हे अग्ने! नय गमय सुपथा”—
“अग्नि” यहाँ मार्गदर्शक देवता, सर्वज्ञ ईश्वर का प्रतीक है।
“नय, गमय”—दोनों धातुओं का प्रयोग आग्रह और तीव्रता को दर्शाता है।
“सुपथा”—
“सु” = शुभ, कल्याणकारी
“पथ” = मार्ग
अतः “सुपथ” वह मार्ग है जो निःश्रेयस की ओर ले जाता है।
“सुपथेति विशेषणं दक्षिणमार्गनिवृत्त्यर्थम्”—
यहाँ शंकराचार्य की सूक्ष्म दृष्टि प्रकट होती है।
“सुपथ” केवल सामान्य “अच्छा मार्ग” नहीं, बल्कि विशेष रूप से—
दक्षिणमार्ग (पितृयान) से निवृत्ति का सूचक है।
दक्षिणमार्ग—
कर्मप्रधान
चन्द्रलोकगामी
पुनर्जन्म (गतागत) से युक्त
इसके विपरीत—
देवयान (उत्तरमार्ग)—
उपासना एवं ज्ञानप्रधान
ब्रह्मलोकगामी
क्रममुक्ति का मार्ग
अतः “सुपथ” = देवयान मार्ग।
“निर्विण्णोऽहम् अस्मिन् दक्षिणेन मार्गेण गतागतलक्षणेन”—
यहाँ साधक की आन्तरिक स्थिति अत्यन्त मार्मिक है।
“निर्विण्ण” = वैराग्ययुक्त, विरक्त
“गतागतलक्षण” = बार-बार जन्म और मरण का चक्र
अर्थात्—
“मैं इस जन्म-मरण के चक्र से ऊब चुका हूँ।”
यह वैराग्य ही ज्ञान का प्रथम सोपान है—
“नित्यानित्यवस्तुविवेकः, इहामुत्रफलभोगविरागः”।
“अतः याचे त्वां पुनः पुनः”—
यहाँ पुनरुक्ति आर्तभाव और आश्रयभाव को प्रकट करती है।
साधक अब पूर्णतः ईश्वर-शरणागत हो गया है।
“गमनागमनवर्जितेन शोभनेन पथा नय”—
यह वाक्य इस सम्पूर्ण पदांश का हृदय है।
“गमनागमनवर्जित” = जहाँ न आवागमन है
अर्थात्—अजन्मा अवस्था, मोक्ष
अतः साधक केवल स्वर्ग या लोकप्राप्ति नहीं चाहता, बल्कि—
संसार-चक्र से पूर्ण निवृत्ति चाहता है।
तात्त्विक विवेचन
यह पदांश तीन प्रमुख अवस्थाओं को प्रकट करता है—
1. वैराग्य (निर्विण्णता)
संसार के चक्र से ऊब—
ज्ञान की अनिवार्य भूमिका
2. मार्ग-भेद का विवेक
दक्षिणमार्ग = पुनर्जन्म
उत्तरमार्ग = मुक्ति की ओर
3. ईश्वर-शरणागति
स्वतन्त्रता का अभाव स्वीकार कर, ईश्वर से मार्गदर्शन की याचना
विद्या–अविद्या एवं समुच्चय
यहाँ—
दक्षिणमार्ग → अविद्या (कर्म)
सुपथ (देवयान) → विद्या (उपासना)
साधक अब अविद्या से निवृत्त होकर विद्या की ओर अग्रसर है।
किन्तु शंकरमत के अनुसार—
विद्या भी अन्ततः ज्ञान में विलीन होनी चाहिए।
अद्वैत की अन्तिम परिणति
यद्यपि यहाँ अभी भी देव–भक्त का भेद है, तथापि—
“गमनागमनवर्जित” अवस्था
“सुपथ” की खोज
ये दोनों मिलकर उस स्थिति की ओर संकेत करते हैं जहाँ—
न मार्ग है, न गन्तव्य
न साधक, न साध्य
केवल—
एकमेव अद्वितीय ब्रह्म
यह पदांश साधक की परिपक्वता का घोष है—
अब वह केवल सुख या स्वर्ग नहीं चाहता
वह जन्म-मरण के चक्र से पूर्ण निवृत्ति चाहता है
अतः—
“हे अग्नि! मुझे उस मार्ग पर ले चलो जहाँ से लौटना न हो”—
यही इस प्रार्थना का सार है।
और यही उपनिषद् का अंतिम संदेश भी—
वैराग्य, उपासना और अन्ततः आत्मज्ञान के द्वारा
संसार-चक्र से मुक्त होकर अद्वैत ब्रह्म में स्थित होना ही परम पुरुषार्थ है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
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