पेड़ के नीचे
झपकी लेता एक
बूढ़ा…
पेड़ के नीचे
झपकी लेता एक
बूढ़ा…
धूप की थकी किरणें
उसके चेहरे पर उतरकर
धीरे-धीरे
स्मृतियों में बदल जाती हैं।
झुर्रियों की लकीरों में
बीते मौसम सोए हैं—
कभी वसंत की हरियाली,
तो कभी पतझड़ की खामोशी।
उसकी साँसों की चाल में
अब भी खेतों की लय है,
और हथेलियों की कठोरता में
मिट्टी का अपनापन।
वह सो नहीं रहा
बस थोड़ी देर के लिए
वक़्त से आँखें चुरा रहा है,
जैसे कोई बच्चा
खेल के बीच ठहर जाए।
पेड़ की छाँव
उसे ढक लेती है,
जैसे पुरानी माँ
अब भी उसके माथे पर
हाथ फेर रही हो।
हवा आती है
धीरे से,
और उसके सफ़ेद बालों में
बीते दिनों की कहानियाँ उलझा जाती है।
उसकी झपकी में
कोई सपना नहीं,
बस एक सुकून है—
जो जीवन भर की दौड़ के बाद
आकर ठहर गया है।
पेड़ के नीचे
झपकी लेता एक
बूढ़ा…
दरअसल
जीवन की भागदौड़ से
थोड़ा-सा
जीवन ही चुरा रहा है।
मुकेश ,,,,,,
No comments:
Post a Comment