पुराना तकिया
1
पुराना तकिया
बिस्तर के कोने में पड़ा है
जैसे कोई चुप आदमी
घर में रहकर भी कहीं और हो।
2
उसमें रूई कम,
साँसें ज़्यादा भरी हैं
हर रात की थकान
धीरे-धीरे उसमें उतरती रही।
3
नया तकिया सख़्त है,
सीधा, बेदाग़—
पर ये पुराना
सर की झुकावट पहचानता है।
4
उसके खोल पर
पीले पड़े धब्बे हैं
शायद कुछ सपनों ने
वहीं दम तोड़ा होगा।
5
कई बार
भीतर से दब जाता है
जैसे अपने ही वज़न से
कोई याद थक गई हो।
6
उसमें सिर रखते ही
नींद नहीं,
बीते दिनों की आहट
पहले चली आती है।
7
कभी-कभी
आँसू भी सोख लेता है
बिना कोई सवाल किए—
जैसे पुराना दोस्त।
8
उसकी सिलाई
कहीं-कहीं उधड़ गई है
फिर भी बिखरता नहीं,
बस थोड़ा और नरम हो जाता है।
9
धूप में रखो तो
एक हल्की-सी गंध उठती है
जैसे बीते वक़्त
धीरे-धीरे बोल रहा हो।
10
नया तकिया
अलमारी में सजा है,
और ये पुराना
हर रात का सच जानता है।
11
उस पर सिर रखकर
कितनी बार
खुद से बातें की हैं—
वो सब अब भी उसमें बचा है।
12
एक दिन
इसे बदल दिया जाएगा
पर कुछ रातें
फिर भी अधूरी रह जाएँगी।
13
पुराना तकिया
कुछ नहीं कहता,
बस हर दर्द को
आकार देता रहता है।
— मुकेश
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